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आलेख – राजनीति में तो हावी नेपोटिस्म है इसकी कोई बात क्यों नही – डॉ चंद्रकांत रामचंद्र वाघ

अभी तक फिल्मो की नेपोटिजम पर ही बात हो रही है । इसके समानांतर मे भी एक और नेपोटिजम की इंडस्ट्री जोर शोर से पिछले सत्तर साल से चल रही है । जिसे देखकर भी देश अनदेखा कर रहे हैं । यहां तो जिस स्थिति मे जो है उसी पर पुत्र पुत्री भी आसीन हैं । चलो ज्यादा भूमिका न बताते हुए राजनीति मे व्यापत नेपोटिजम की बात करानी चाहिए । कुल मिलाकर राजनीति भी फिल्म की तरह व्यवसाय से ज्यादा कुछ नहीं है । सेवा कम मेवा ज्यादा है । हालात यह है कि लोगों को मालूम है कि राजनीति मे जहर से ज्यादा कुछ नहीं है । पर सब नेता नीलकंठ बनने को आतुर है । बहुत अच्छा व्यवसाय है जहां हर पार्टी में अघोषित रूप से इस व्यवस्था पर अपनी मुहर लगाकर एक खूबसूरत नाम लोगों को थाली में परोसा गया है वह है ” लोकतंत्र ” फिर इस लोकतांत्रिक वयवस्था के तहत हर पार्टी चल रही हैं । हम इनके व्यवसाय को लोकतंत्र के नाम के बने वयवस्था मे रह रहे है । अगर कोई साठ साल का हो गया तो शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त कर दिया जाता है । पर यहां उल्टा है साठ के उम्र मे भी यह महानुभाव युवा तुर्क कहलाते हैं । इसी कारण यहां के हलकों में यौन शोषण के मामले और बलातकार के मामले देश ने देखा है । प्रेम प्रसंगों पर चर्चा करना बेमानी होगी । चलो विषय पर ही आया जाये । आज पूरे देश में जितने भी नेता है सब अपने होनहार बच्चो को अपने गुरूकुल में राजनीतिक ट्रेनिंग दे रहे हैं । यह गुरु द्रोण कोई भी दांव अपने उत्तराधिकारी के लिए छोड़ना नहीं चाहते । यही कारण है कि अपने सभी अनुभव और चक्रव्यूह को तोड़ने के गुर अपने अभिमन्यु को बताकर राजनीतिक रूप से यहा के लिए मानसिक शारीरिक व आर्थिक रूप से दक्ष करके रखे रहते है । जिससे युवराज की ताजपोशी किसी भी विपरीत परिस्थिति में हो सके । कोई भी एक नेता किसी भी पार्टी मे नही होगा जिसने कभी भी यह नहीं कहा होगा कि मेरा बेटा देश की सेवा के लिए सेना में जाएगा । यह सोच अगर किसी नेता मे मिल जाए तो इस देश में उममीद करना ही वयरथ है । चलो पुनः मुद्दे पर आया जाये इस वयवसाय की शुरुआत वयवसायी ( नेता ) द्वारा अपने बच्चे के लिए अपने ही दल मे बने युवा विंग का छोटे मोटे पद पर नियुक्ति कर राजनीति का आरंभ । फिर हर छोटे बडे जलसे मे इस होनहार युवा नेता का अपने दल के बडे नेताओं से परिचय और उसकी पार्टी के लिए किये गये त्याग का बखान । फिर हर आयोजन के पोस्टर मे युवा नेता की फोटो शामिल कर जनता के बीच उसकी गतिविधियों से परिचय । फिर क्षेत्र मे किसी भी समस्या के लिए गतिविधियों जिसमे अपरोक्ष रूप से दादागिरी भी शामिल रहती हैं उस पर अपनी मुहर लगाना । ये वो लोग है जिन्होंने आजादी के बाद रियासतों का विलय किया वहीं उस दिन अपने सूबे बनाने का काम चालू किया । इनहोने राजाओ के प्रिवीपरस खतम किये और पेंशन और बाकी की सुविधा के साथ अपनी चालू कर ली । इनहोने राजाओ के ताज आदि छीन लिया और अपने माननीय होने का संबोधन चालू कर लिया । अप्रत्यक्ष रूप से अपना इलाका अपनी जागीर ंबना कर एक अघोषित लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुकूल बना ली जहां चुनाव वंशानुगत बनकर रह जाये । नेताओं के पुत्र नेता बाकी कार्यकर्ता ओ के बेटे कार्यकर्ता यह परंपरा सी बन गई है । कोई अगर बगावत करते नजर आये तो अनुशासन हीनता के दायरे में आ जाता है । अभी एक बडे पार्टी के नेताओं द्वारा लिखी चिट्ठी भी अनुशासन हीनता के दायरे में आई है । यह सभी दलों का हाल है । बस राजनीति के नेपोटिजम पर लिखा है । बस इतना ही
डा .चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ

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