छत्तीसगढ़

राज्योत्सव में छत्तीसगढ़ी सहित विविध रंग में रंगे गीत-संगीत ने दर्शकों का मन मोह लिया

राजधानी के साइंस कालेज मैदान में आयोजित राज्योत्सव के अंतिम दिन की सांस्कृतिक संध्या में विविध रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम ने दर्शकों को बांधे रखा। सांस्कृतिक कार्यक्रम में दुर्ग जिले के कुलेश्वर ताम्रकार एवं साथियों ने अंगना में भारतमाता के, सोन के बिहनिया ले चिरइया बोले, छत्तीसगढ़ ल कइथे भइया धान का कटोरा, आजाबे-आजाबे न अमरईया के तीर गोरी आ जाबे न, ढ़ोल बाजे रे नगाड़ा बाजे रे ने लोक गीतों के माध्यम से दर्शकों को रोमांचित किया।

सांस्कृतिक संध्या में धमतरी जिले के सिहावा नगरी के सुरेन्द्र कुमार सोरी एवं साथी कलाकारों ने पारम्परिक वेशभूषा एवं वाद्ययंत्रोें के साथ मांदरी नृत्य, गरियाबंद जिले के मोहित मोगरे एवं साथियों ने कमार नृत्य, बस्तर जिले के कलाकारों ने ककसाड़ नृत्य, नारायणपुर जिले के बुटलूराम माथरा और साथी कलाकारों ने गेंड़ी नृत्य, रायपुर के प्रशांत ठाकर ने सुगम संगीत और रायपुर के कुमार पंडित एवं रेशमा पंडित ने तबला वादन प्रस्तुत किया।

बिलासपुर के अंचल शर्मा और साथियों ने मधुर सुगम संगीत प्रस्तुत किया जिसमें भजन, फिल्मी गीत और जसगीत गाया गया। सुगम संगीत में कलाकारों ने मोर भोला हे भंडारी, झनकी पायल मस्ती में, तुम मिल गये हो तो, मोर संग चलव जी और मेहमा जो हमारा होता है आदि गीतों से दर्शकों का मनोरंजन किया। कार्यक्रम के अंत में कवि सम्मलेन का आयोजन किया गया। जिसमें कवि मीर अली मीर, रामेश्वर वैष्णव, मुकुन्द कौशल, कृष्णा भारती और अजय अटापट्टू ने काव्यपाठ कर दर्शकों का मन मोह लिया।

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