सुनियोजित साजिश के तहत रामचरित मानस पर किया जा रहा जान बूझकर विवाद खडा |

आज डा.वाघ की वाल पर हम पहले बिहार फिर उत्तर प्रदेश मे सुनियोजित साजिश के तहत रामचरित मानस पर जान बूझकर विवाद खडा कर इसे वोट की राजनीति का हिस्सा बनाकर समाज मे अपने फायदे के वैमनस्य पैदा करने की साजिश की जा रही है । विगत तीन चार बार से चुनाव मे बुरी तरह से पीटने के बाद अब यह कोशिश की जा रही है की समाज मे विद्वेष घृणा फैला कर अपना उललू साधा जाए । हाशिए मे आए ये नेता इतने विचलित हो गए है अपने राजनीति के लिए यह किसी भी सीमा तक जाने को तैयार रहते है । हद तो तब हो गई जब अपने सत्ता मे रहते यही लोग है जो आतंकवादियो को रिहा कर रहे थे भला हो न्यायालय का जिसने इनके मंसूबो पर पानी फेर दिया । जिस चौपाई पर बिहार के मंत्री का ऑडियो वायरल होकर पूरी राजनीति की बिसात की ही पोल खुल गई है । वह चौपाई ” ढोल गंवार पशु ” वाली चौपाई के निरीह पशु का ही चारा तक यह लोग जीम लिए या खा लिए यह लोग अब मानव को क्या छोड़ेंगे । जिन लोग अपनी राजनीति के खातिर चौबीस लोगो को मार दिया यह लोग आम लोगो की चिंता करेंगे । इतनी बार यह लोग सत्ता मे रहे तब क्यो नही इन लोगो का जीवन स्तर उठाया । एक परिवार ने लगातार तीन बार शासन किया था तब तो चारा खाने से फुर्सत नही थी जब राजनीतिक संकट दिख रहा है तब इस वर्ग की याद आ रही है । वही हाल उत्तर प्रदेश के इन नेताओ का था क्यो नही इस वर्ग के उत्थान मे लगे रहे तब तो सैफाई मे मुंबई के भांड लोग-बाग के नाच मे शासकीय पैसा व्यय करने मे मस्त थे तब इन्हे दीन हीन की याद क्यो नही आई । यह वही लोग है जो आज इस वर्ग की बात कर रहे है जिनका चर्चित गेस्ट हाउस कांड भी हुआ था । किसी को भी इनकी फिक्र होती तो जो पारिवारिक राजनीतिक दल बना कर रखा गया है उसमे यह वर्ग पहले से पद मे रहता । वही जो बंधु मुद्दा उठाए हुए है उनके परिवार के एक सदस्य तो अभी भी सवर्ण पार्टी के दल मे बने हुए है । वही स्वंय भी तो अभी तक यही राजनीति कर रहे थे । शायद उनके ज्ञान के चक्षु अपनी राजनीतिक सुविधाओ व दल के हिसाब से ही खुलते है । अगर इन राजनीतिक नेताओ मे इतना ही पुरूषार्थ है तो किसी अन्य धर्म के धर्म ग्रंथ मे टिप्पणी कर देखे । यह सब लोग बौखलाए हुए है सभी लोग बारी बारी गठबंधन कर देख लिए उसका हश्र भी देख लिया अब मानसिक रूप से दिवालिया हो गये है । अपना भविष्य अंधकार मय दिख रहा है इसलिए राजनीतिक अस्थिरता फैलाने की कोशिश से ज्यादा नही है । उल्लेखनीय है यह विफल कोशिश दो बार और कर चुके है । राजनीतिक रूप से पिटे हुए मोहरे है पर साथ भी नही रहना चाहते सबको अपने अस्तित्व की चिंता है । वह एक ही वोट बैंक है जिसके कब्जे के लिए अपना निम्न स्तर दिखा रहे है । इन जयचंदो को नही मालूम की जयचंद का भी हश्र क्या हुआ था । हमारे धार्मिक ग्रंथ के अपमान का बदला लोग लोकतांत्रिक रूप से इनसे लेंगे । बस इतना ही डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ





