विदेश जाना आम आदमी की होती है दिली ख्वाहिश, पढ़ें एक रोचक संस्मरण
विदेश का संस्मरण 1
किसी भी मध्यम वर्ग की या एक आम आदमी की तीन इच्छा बहुत ज्यादा रहती हैं। हर आदमी इन तीन इच्छा पर ही अपनी उर्जा लगाता है । पहली इच्छा की उसका स्वंय का खुद का मकान हो भले छोटा हो अगर बडे शहर मे रह रहा है तो एक फ्लैट हो । इसलिए बोलचाल की भाषा में हम कह ही डालते है कि भैया खुद की छत है । सामान्यतः जिन लोग मकान बनाते है और जब घर का लैंटर डलता है तो आदमी कह ही डालते है कि चलो आज छत डल गई । वहीं दूसरा सबसे बड़ी इच्छा यह रहती है कि गाडी हो । इसलिए हर आदमी दो चकके से चालू होती है फिर कई लोग पहले सेकंड हैंड कार लेते है फिर कुछ समय बाद नई कार लेते है । इसमें भी कुछ लोगों की प्राथमिकता मे पहले कार फिर मकान रहता है । फिर वह इच्छा या स्वपन जिसमें कि विदेश जाने मिले यह जानने की उत्सुकता सबकी रहती है । पर ज्यादा जानकारी न होने के कारण कई लोगों के पास संसाधन होने के बाद भी जाने का संयोग नहीं बन पाता । वहीं कुछ लोग ट्रैवल कंपनी के द्वारा भी हो आते है । पर आजकल अधिकांश पालको के बच्चे विदेशों मे नौकरी होने के कारण तो अब ज्यादा संभव हो गया है । वहीं कुछ लोगों को अपने पोते पोतियो को संभालने की जिम्मेदारी के कारण भी लंबे समय तक रहना पडता है। चलो विषय पर आऊं शायद मध्यम वर्ग की एक दिली इच्छा रहतीं हैं कि कम से कम एक बार हवाई जहाज मे बैठने ही मिल जाए । मेरा एक दोस्त है वो हर समय कहता है कि यार एक बार हवाई जहाज मे बैठने की इच्छा है भले यहां से दिल्ली जाऊंगा और तुरंत वापस आ जाऊंगा। वहीं एक मेरा मरीज हर समय कहता है साहब एक बार मुंबई हवाई जहाज मे मोला ले जाबे । कभी-कभी लगता है कि किशमत मे भी यह यात्रा का योग रहता है । जब यह तय हो गया कि हम लोग को यूरोप जाना है तो एक अलग से उत्सुकता और एक अंदर से भय भी था कि वहां पर हम अपने सामन्जस्य को बैठा भी पाऐंगी कि नहीं । शुरू हुआ पासपोर्ट बनवाने की प्रक्रिया मुझे अच्छे से याद है कि मेरे लडके सौरभ को जहां नाइजीरिया जाना था और बहुत कम समय था तो मैंने उसके पासपोर्ट के लिए ऐजेंट से संपर्क किया था । काफी महंगे मे बना था। पर अब तक यह प्रक्रिया बहुत पारदर्शी हो गई । पहले हम लोगों ने फार्म लाया । चलो आगे की प्रक्रिया पर आगे लिखूंगा । बस इतना ही डा चंद्रकांत. रामचन्द्र वाघ। क्रमशः
संस्मरण दो
अब जो फार्म की औपचारिकता है उसे हम भरने मे लग गये। सभी आवश्यक पासपोर्ट के लिए लगते है उन्हे एकत्रित करने मे दो तीन दिन लग गये । पर पासपोर्ट का काम टीसीएस के पास से आने के बाद अमूल परिवर्तन दिखने लगा है ऐसा कहा जाने लगा। आपको टोकन नंबर मिलेगा उस क्रमानुसार ही काम होता है । बस फार्म जमा करना था वो कर दिया गया । अब यहां से पासपोर्ट आफिस से आपके फार्म की स्थिति कैसी है यह आपको पासपोर्ट आफिस से मेसेज द्वारा अवगत करा दिया जाता है । इस क्रम मे हमने भी जब फार्म भरा हमारे फार्म के स्टेटस का मेसेज हमे मिलने लगा । मनीषा के फार्म को तो स्वीकार कर लिया गया पर मेरे फार्म को नहीं स्वीकारा गया । बाद मे पता चला कि मेरे पैन कार्ड और आधार कार्ड मे अंतर था एक मे डा के साथ पिता का नाम भी अंकित था दूसरे मे नहीं था । फिर मैंने अपने ड्राइविंग लाइसेंस को जमा किया जिसमे समानता थी । फिर हमे पासपोर्ट अधिकारी को यह बताना था कि हम किस उद्देश्य से जाना चाहते हैं । फिर अधिकारी ने भी सामान्य बात की और जाने के बारे मे पूछा । फिर हमारा वेरिफिकेसन की स्थिति मे हम आ गये । फिर एलआईबी के अधिकारी तफतीश के लिए आए और हम दोनों के बारे मे पूरी जानकारी लेकर अपनी रिपोर्ट पासपोर्ट अधिकारी के पास भेज दी । इस प्रक्रिया के बाद फिर हमे जिले मे जहां से वेरिफिकेसन होता है हमे उस पुलिस अधिकारी के सामने उपस्थित होना पड़ा । यहां से सभी औपचारिकता करीब करीब स्थानीय स्तर की पूरी हो गई थी । जब पुलिस अधिकारी ने हमारे बारे मे जानकारी जमा कर दी तो उसका भी मैसेज आ गया । यह भी बता दिया गया कि कितने दिनों मे आपके पास पासपोर्ट आ जाएगा । अंत मे रजिस्टर्ड पोस्ट से पासपोर्ट आ ही गया । काफी खुशी थी कि बहुत सरलता से और कम खर्च और कम समय मे ही पासपोर्ट हाथ मे आ गया । पहले यही काम काफी दुरूह लगता है। पर जब इसमे अंदर जाओ तो बहुत ही आसान सा लगने लगता है । अब थोडी उम्मीद जागी कि जो सपना देख रहे है उसके करीब पहुंचने का अहसास लग रहा था । एक अंदर की खुशी थी वो दिखाई भी नहीं जा सकती थी । अब आगे वीसा पर ।
बस इतना ही
डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ




