देश ने सन दो हजार चार मे एक फैसला ले लिया कि अब किसी भी शासकीय कर्मचारियों की नियुक्ति पर पेंशन समाप्त कर दिया गया । सामाजिक सुरक्षा के तहत मिलने वाली इस पर कडा निर्णय लेकर हर समय के लिए यह निधि खत्म कर दी गई । कारण यह बताया जा रहा है कि शासन को इस पर काफी बड़ी राशि इन लोगों को पेंशन देने मे ही चली जाती है । जिससे देश का विकास रूक जाता है । पर जो वयक्ति अपनी पूरी जिंदगी सेवा मे गुजार देता है । पर उसके बुढापा का सहारा वो पेंशन जिससे वो निश्चिंत रहता है उस पर प्रहार कर इनके साथ नाइंसाफ़ी की है । जिन कारणों से लोग शासकीय सेवा में आने के लिये उत्सुक रहते थे पर वो सामाजिक सुरक्षा के कवच कुंडल नहीं रहने से लोगों में भी शासकीय सेवा का मोह भी खत्म होते जा रहा है । यही कारण है कि आज के युवा प्रायवहेट सेक्टर मे ही जा रहे है । पर दूसरी तरफ हमारे यहां के विधायक व सांसद पर यह बातें नहीं लागू होती है । पूरे देश में पता नहीं कितने विधायक है और पूर्व विधायक की तो गिनती गिनना मुश्किल है । कहा जाता है कि एक दिन भी विधायक अपना काम कर ले तो उसकी पेंशन सुनिश्चित हो जाती है । किसी मे मैंने पढा कि अगर कोई विधायक और सांसद भी रहा तो वो बंदा दोनों की पेंशन ले कर मजा करेगा । बात यहा तक भी नहीं हारने के बाद भी अगर वह अपने राजनीतिक पहुंच से किसी निगम का या मंडल का अध्यक्ष बन जाये तो वो तीनो शासकीय सुविधाओं के लेने का हकदार है । कुल मिलाकर इनके उपर होने वाला खर्च से देश के माली हालात व आर्थिक स्थिति मे कोई भार नहीं पडता । छोटे से छोटे बात मे तूफान खडा करने वाले यह जनप्रतिनिधि जो लंबे समय तक संसद नहीं चलने देते । पर अपने वेतन भत्ते के समय इनकी एक जुटता देखने लायक रहती है । सिर्फ कुछ समय मे ही हर्षोललास से ध्वनि मत से पारित हो जाता है । देश के लिए चिंता उस समय गायब हो जाती है । देश पर होने वाले आर्थिक भार पर इन्हे कोई लेना देना नही रहता । जब तक स्वहित है तो इनके लिये देश हित नेपथ्य मे चला जाता है । कुल मिलाकर देश सेवा के नाम से वयापार है । सरकार को चाहिए इन सब जनप्रतिनिधियो के सुविधाओं को खत्म कर हर समय के लिए देश का बहुत बड़ा संसाधन जाया होने से बचाया जा सकता है । जो सांसद विधायक या जो विधानसभा व संसद इन शासकीय कर्मचारियों के पेंशन को बंद करने का काम करती है वैसे उनका यह नैतिक अधिकार खत्म हो जाता है कि वे उस सुविधाओ का स्वंय लाभ ले । पर यह सब नैतिकता धरे की धरी रह जाती है । कुछ नहीं सिर्फ अपना हित सधना चाहिए भले वहा बैठकर दूसरो के हित खत्म करते रहे । यही कारण है कि शासकीय कर्मचारियों के पेंशन को खत्म करने के समय कोई विरोध के स्वर नहीं दिखे । वहीं इस देश का नागरिक भी दिल से चाहता है कि इन लोगों की भी सभी सुविधाओं से वंचित रखने की आवश्यकता है । देश में इन असमानताओं को खत्म होने का समय आ गया है । वही देश को भी पता चले कि सुविधा खत्म होने के बाद भी कितने लोग राजनीति करने का साहस करते है । पर लोगों मे भी यह चेतना जागृत होनी चाहिए कि इन लोगों ने जो अपने विशेषाधिकार बना कर रखे हुए हैं वो लोकतंत्र के नाम से देश के साथ ज्यादतीयो से ज्यादा कुछ नहीं है । ऐसा कर ही हम समृद्ध भारत बनाने मे सफल होंगे । बस इतना ही
डा .चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ



