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आलेख – सोनिया गांधी के कमान संभालने पर बगावती सुर क्यूं – डॉ. चंद्रकांत रामचंद्र वाघ

Dr. Chandrakant wagh
डॉ. चंद्रकांत रामचंद्र वाघ

सन 1969 के उस दौर में कांग्रेस पुनः खडी हो गई है । पर परिस्थियों में काफी परिवर्तन है । पहले भी वरिष्ठ नेताओ के साथ सत्ता के गलियारों के कारण उन्हे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया । तब दो कांग्रेस अस्तित्व में आई सिंडीकेट कांग्रेस और इंडिकेट कांग्रेस । पर जनता ने नेहरू गांधी परिवार इंदिरा गाँधी जी के इंडिकेट कांग्रेस का ही समर्थन किया । आगे चलकर सिंडीकेट कांग्रेस का भविष्य ही खत्म हो गया । फिर इंदिरा गाँधी जी की ही कांग्रेस अपने वजूद को बचाने मे सफल रही । फिर इंदिरा गाँधी जी को चुनौती देने वाला कोई नहीं रहा । यह सिलसिला सोनिया गांधी जी के कमान सम्हालने तक रहा । फिर सोनियां गांधी जी के काम सम्हालने पर बगावत के सुर फिर सुनाईं देने लगे । सबसे पहले तो शरद पवार जी ने ही विदेशी मूल का मुद्दा बनाकर अपनी राष्ट्रीय स्तर का दल राष्ट्र वादी कांग्रेस बनाई । आज यही लोग अपनी बात भूलकर सत्ता की गलबहियाँ कर रहे है । पता नहीं कितनों ने इस दल से नाता तोड़ा और फिर अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए जोडा इस देश ने भी देखा है । शायद चाहे तृणमूल कांग्रेस हो या कोई भी अलग बनी कांग्रेस सबकी मजबूरी उनकी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता है जो उनकी राजनीति को अपने मूल से जुदा होने नहीं देती । आज भी वही हालात है इन वरिष्ठ नेताओ की अंतिम पहचान ही नेहरू गांधी जी के परिवार के इर्द-गिर्द ही रही है । वैसे भी इनमें से कोई भी जमीनी नेता नहीं है । इसलिए सोनिया गांधी जी को भी मालूम है इन लोग विरोध करने के बाद भी के इनकी कहीं जाने की हिम्मत नहीं है । आज जो भी इनकी राजनीति हुई है या पद मिला है सिर्फ सेवा के कारण ही मिला है कोई भी ऐसा जमीनी काम नहीं है जिससे यह लोग अपने वार्ड का भी चुनाव जी सके । यही कारण है कि पूरी तरह से बैक फुट मे आ चुके है । जैसे खबरें आ रही हैं कि सोनिया गांधी जीने इनसे मिलने तक का समय नही दिया है । दूसरी तरफ़ इन लोग अपने किये हुए कार्यो का बखान कर अपनी निष्ठा दोहराना चाह रहे है । पर जो राजनीतिक बयानों से जो छबि पार्टी की खराब हुई है उसे अब कैसे ठीक किया जाये इस पर ही काम हो रहा है । वहीं सत्ता से हटने के बाद राजनीतिक प्रभाव कितना क्षीण होता है इसका अहसास भी पार्टी नेतृत्व को हुआ होगा । जिस गलियारों मे कभी कोई प्रश्न करने की हिम्मत नहीं करता था कोई चुनौती देने का दुःसाहस करे वो भी वो जो कृपा से बडे बने हो तो नाराजगी स्वाभाविक है । एक बात और स्व . सीताराम केसरी का वाक्या यह लोग शायद भूल गए । याद रहता तो ऐसी हिमाकत नहीं करते । यह जरूर है कि लोकतंत्र में सबकी राजनीतिक इच्छा होती है स्वाभाविक है । पर इन्हे भी अपने राजनीतिक वजूद का खयाल रखना चाहिए । क्योकि जमीन से जुडा नेता एक बार कोशिश करे तो सामने वाले को भी उसकी अनदेखी करना मुश्किल हो जाता है । यही कारण है कि आज कांग्रेस मे कोई दूसरा चेहरा तैयार नहीं हुआ कि जो अध्यक्ष पद के लिए स्वीकार्य हो । अगर निगाहे जाएंगी तो सिर्फ परिवार मे ही जाएंगी । यही कारण है कि जो जिससे जुडा है वो उनके तरफ से लाबिंग कर सकता है । उसमे कोई हर्ज़ नहीं है । यही कारण है कि बाहर का वो वयक्ति जिसका खुद का कोई भी वजूद होगा वो बगैर बोले खारिज हो जाएगा । आज भी समर्थन के लिए आवाज आ रही हैं वो इन्ही लोगों से जुड़े लोगों की ही है जो यह चाहते हैं कि हाईकमान यही लोग रहे जिससे राजनीतिक अस्तित्व भी बना रहे । वहीं जिन लोगों का आज अपने ही पार्टी मे संशय मे देखा जा रहा है आज उन लोगो की स्थिति ऐसी है कि वे दूसरे विचार धारा के दलो मे भी नही जा सकते । विचारधारा का ऐसा विरोध जो उत्तर दक्षिण हो तो दूसरी राजनीति भी मुश्किल है । यही कारण है कि ” जीना यहां मरना यहां तेरे सिवा जाना कहां ” जैसे हो गई है । कुल मिलाकर अब आगे कुछ सालों तक कोई फिर ऐसी हिमाकत करे यह नही होगा । अब ऐसा कर यह नेतृत्व पुनः सुरक्षित हो गये है । पहले एक नारा पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरूआ ने दिया था ” इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा ” बस थोड़ा सा समय के हिसाब से बदलाव हुआ है इसे कांग्रेस के नेताओ को समझने की आवश्यकता है । कुछ भी कहो आज भी सोनिया गांधी जी का प्रभाव है जो परिलक्षित हो रहा है । बस इतना ही
डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ

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