आज से पैंतालीस साल पहले पच्चीस जून सन उननीस सौ पचहतर को पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगाया था । इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा जी के पास विकल्प नहीं बचा था । अंत में इंदिरा गांधी जी ने ” आपातकाल ” लगा दिया । जो आगे चलकर भारत का इतिहास ही बन गया । होना तो यह चाहिए था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के खिलाफ उन्हे सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए था ।
आपातकाल मे लोगों की बोलने की स्वतंत्रता प्रेस की आजादी पर अंकुश ही लग गया । सिर्फ सरकार की न्यूज ही समाचार का माध्यम था। आज जिन लोग मोदी जी का विरोध कर रहे है तो उन्हे पैंतालीस साल पहले भी गौर करना चाहिए था। मुझे अच्छे से याद है कि उसी दिन गांधी चौक में स्व. मधु लिमये की आमसभा थी जो स्थगित हो गई और उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया था।
वहीं पूरे देश मे विपक्ष के नेताओ को जो जहां था वहीं पकड़ लिया गया । प्रेस की आजादी खत्म कर दी गई। उन समाचार पत्रों के मालिक व पत्रकार जो शासन के कदमों से सहमत नही थे वो भी अंदर हो गये । पूरा देश एक भय के साये मे रहने को मजबूर था । देश की पूरी सत्ता प्रधानमन्त्री स्व.इंदिरा जी के हाथो मे ही थी । नेताओं के साथ राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के स्वंय सेवको को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। पूरी कांग्रेस मे एक भी नेता ऐसा नहीं बचा जो आपातकाल का विरोध कर सके । उस समय आसाम के नेता स्व.देवकांत बरूआ तब कांग्रेस के अध्यक्ष थे। उन्होंने एक बहुत प्रसिद्द नारा दिया था ” इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा । ” तबकी बार यह नारा जोरशोर से चल रहा था । पूरी राजनीतिक गतिविधियों पर विराम लग गया था ।
इंदिरा जी ने तब सर्वोच्च न्यायालय के तीन वरिष्ठ न्यायधीश की अनदेखी कर जूनियर को मुख्य न्यायधीश बनाया गया । जिसने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला बदला । अंत मे उन्हे लोकतंत्र के नाम से जनता के सामने आना पडा । उसी समय संत विनोबा भावे जी ने आपातकाल को ” अनुशासन पर्व ” कहा । पर एक बात तय है कि आपातकाल के बुराइयों के बीच मे कुछ बातें हमे अपने नियमित जीवन मे देश वासियों को लाने की आवश्यकता थी । निश्चित एक अनुशासन पनपा था ट्रेन समय पर चलती थी । आफिस का काम बिलकुल सही समय मे होता था । भ्रष्टाचार डर के मारे काफी कम हो गया था । आफिस में आने जाने का जो समय था उसका पालन करते थे ।
दुर्भाग्य से हमारे यहां लोकतंत्र मे खुली आजादी मानी जाती है। किसी का कोई नियंत्रण नहीं है वही बगैर पैसा के कोई काम तक नहीं होता। आवश्यकता है इस अच्छे अनुशासन को अपनाने मे क्या आपत्ति है। कुल मिलाकर यह आपातकाल खट्टा मीठा दोनों था। पर खट्टा बहुत ज्यादा हो गया जिसके कारण से लोगों ने इसे नकार दिया। पर यह तय है आने वाले हर शासको को यह घटना उसे उसकी लक्ष्मण रेखा की याद दिलाते रहेगी । पर लोगों को भी अपने नागरिक कर्तव्यो का अहसास जो आपातकाल मे हुआ यही समय है हमे आज अपने आचरण में उतारने की आवश्यकता है । बस इतना ही डा .चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ।
(लेखक डा .चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ जाने माने आयुर्वेद चिकित्सक हैं एवं विभिन्न समाचार पत्रों में उनका लेख प्रकाशित होता है। यह लेखक के निजी विचार हैं)




