मसान होली – यहां रंग गुलाल से नही बल्कि चिता भस्म से मनाया जाता है होली का उत्सव

हिंदू धर्म में होली का त्योहार बेहद खास होता है। जिसकी प्रसिद्धि भारत के लगभग हर कोने में देखने को मिलती है, बस इसका नाम और इसे मनाने का तरीका थोड़ा बदल जाता है। इस साल होली का त्योहार 25 मार्च 2024 को मनाया जाएगा। जैसा कि आप जानते ही होंगे कि मथुरा, वृंदावन में फूलों और लड्डुओं से होली खेली जाती है, जबकि बनारस में चिता की भस्म से होली खेली जाती है। जी हां, बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी की भस्म होली बड़ी ही निराली है।
इस तरह यह परंपरा शुरू हुई
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव मां पार्वती का गौना करके उन्हें काशी ले आए थे। तब उन्होंने अपने गणों से रंग और गुलाल से होली खेली थी, लेकिन भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व, किन्नर और श्मशान में रहने वाले अन्य प्राणियों के साथ वह इस खुशी को नहीं मना पाए। इसलिए रंगभरी एकादशी के ठीक एक दिन बाद उन्होंने श्मशान में रहने वाले भूत-पिशाचों के साथ होली खेली। तभी से यह प्रथा प्रारंभ मानी जाती है।
ऐसे मनाई जाती है मसाने की होली
चिता भस्म से होली का उत्सव आपको काशी में ही देखने को मिलेगा। जिसमें भोलेनाथ के भक्त नाचते, गाते और जश्न मनाते हैं। हर-हर महादेव से गूंज उठा मणिकर्णिका घाट। होली के अवसर पर अबीर और गुलाल एक-दूसरे को चिता की राख अर्पित करते हैं और सुख-समृद्धि और वैभव के साथ-साथ शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
हिन्दू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी के अगले दिन हर साल मसान होली मनाई जाती है. ऐसी मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के एक दिन बाद मसान की होली खेली जाती है. इस साल बनारस में 21 मार्च को मसान की होली खेली जाएगी. इस त्योहार पर लोग चिता की राख से होली खेलते हैं. इस दिन मां पार्वती और भगवान शिव की भी विशेष पूजा की जाती है.
बनारस की मसान की होली को ‘चिता भस्म होली’ कहा जाता है, एक अनोखी और प्राचीन परंपरा है. यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है. ऐसा माना जाता है कि मृत्यु पर शोक मनाने के बजाय, मृत्यु को जीवन का एक चक्र मानकर मनाया जाना चाहिए. मसान की होली भगवान शिव को समर्पित है, जो मृत्यु के देवता भी हैं. काशी की मसान की होली एक अनोखा और अद्भुत त्योहार है जो हर साल होली के दिन मनाया जाता है. यह त्योहार मृत्यु पर विजय का प्रतीक माना जाता है.
ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव ने मृत्यु के देवता यमराज को पराजित करने के बाद मसान में होली खेली थी. इस घटना को यादगार बनाने के लिए, बनारस के लोग हर साल मसान की होली खेलते हैं. बता दें कि मसान होली हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है. यह त्योहार दो दिनों तक चलता है. पहले दिन लोग चिता भस्म इकट्ठा करते हैं और दूसरे दिन होली खेलते हैं. मसान की होली में शामिल होने के लिए दुनिया भर से लोग आते हैं.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने मसान की होली की शुरुआत की थी. ऐसा माना जाता है कि रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शंकर माता पार्वती का गौना कराने के बाद उन्हें काशी लेकर आए थे. तब उन्होंने अपने गणों के साथ रंग-गुलाल के साथ होली खेली थी, लेकिन वे श्मशान में बसने वाले भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष गन्धर्व, किन्नर जीव जंतु आदि के साथ होली नहीं खेल पाए थे. इसलिए रंगभरी एकादशी के एक दिन बाद भोले शंकर ने श्मशान में रहने वाले भूत-पिशाचों के साथ होली खेली थी. तभी से काशी विश्वनाथ में मसान की होली खेलने की परंपरा चली आ रही है. चिता की राख से होली खेलने की वजह से ये परंपरा देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है.
मसान की होली किस बात का है संदेश?
पूरी दुनिया में भारत का काशी ही इकलौता ऐसा शहर है जहां मसान की होली (चिता की राख से होली) खेली जाती है. चिता भस्म की होली पर काशी विश्वनाथ के भक्त जमकर झूमते हैं. महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर हर हर महादेव के नारे गूंजते हैं. इस अवसर पर देवाधिदेव महादेव के भक्त चिता भस्म की होली खेलते हैं. मणिकर्णिका घाट हर-हर महादेव से गूंज उठता है. होली के मौके पर चिता की भस्म को अबीर और गुलाल एक दूसरे पर अर्पित कर सुख, समृद्धि, वैभव संग शिव का आशीर्वाद पाते हैं. मसान की होली इस बात का संदेश देती है शिव ही अंतिम सत्य है. शिवपुराण और दुर्गा सप्तशती में भी मसान की होली का वर्णन किया गया है.



