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विशेष लेख – अभिव्यक्ति की आजादी की परिभाषा अब हो चुकी बिलकुल सीमित

अभिव्यक्ति की आजादी की परिभाषा बिलकुल सीमित कर दी गई है । अगर देश के खिलाफ कुछ भी बोल लो प्रधानमंत्री को भी कुछ भी बोल दो यह सब अभिव्यक्ति की आजादी है । पर आपने देश के पक्ष मे खडे हो लिया तो फिर तो आपने तो आजादी की सारी सीमा लांघ दी । फिर आप संघी हो बीजेपी हो सब सम्मान शब्दो से नवाजे जाऐंगे।  बस आप जो कह रहे है उसमे उत्तर नहीं देंगे।  किसान आंदोलन मे छब्बीस जनवरी को एजेंसियों ने पहले ही सतर्क कर दिया था।  कुछ भी हो सकता है।  तब छाती ठोककर पूरी जिम्मेदारी ले लिए थे । क्या हुआ तीन सौ पुलिस वाले घायल हुए कहीं धोखे से भी कोई पुलिस वाला जवाब दे देता तो अनहोनी हो जाती। यह इनको मालूम था अंदर से इसी घटना क्रम के इंतजार में थे । बहुत मायूसी हुई होगी  । लाल किले मे जो भी हुआ उसका आक्रोश तो कहीं नहीं दिखाई देता है।  पहलें तो यह हमारे आदमीयो का किया हुआ नहीं था यह सब असामजिक तत्वो के द्वारा किया गया था। यह भाजपा की साजिश है।   अब आज पंजाब सरकार उनके लिए वकीलों को  खडा कर रही है वहीं अब उनके रिहाई की मांग भी जुड़ गई है । भई असामाजिक तत्व व भाजपा के लिए क्यो इतनी मेहनत कर रहे हो ? पुनः विषय पर किसान आंदोलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर के लोगों ने जिसमे ग्रेटाथनबर्ग रिहाना मियां खलीफा ने समर्थन कर दिया।  फिर क्या था लोगों मे उत्साह का माहौल दिखने लगा ।  फिर क्या था देश में सभी अभिव्यक्ति के पुरोधाओं ने इनके पक्ष मे तैनात हो गए । पर झूठ के पैर नहीं होते और सत्य प्रताड़ित हो सकता है पर पराजित नहीं हो सकता है।  बस क्या था इन लोगों की परिभाषा में उस छोटी बच्ची ने दुर्भाग्य से उस टूल किट ही शेयर कर दिया।  आज के तकनीकी संसाधन मे यह बात आप छुपा नहीं सकते ।  फिर कया था दांव उल्टा पड गया पर यहां भी आजादी के दीवानों ने इनका साथ नहीं छोडा।  इनका दोहरा मापदंड कहां से आ जाता है भगवान जाने इन लोगों ने स्वर कोकिला भारत रत्न के टवीट व मास्टर बलासटर भारत रत्न सचिन तेंदुलकर के टवीट जो देश के पक्ष मे था उसे लेकर हाय तौबा मचा दी । सरकार ने तो उसके कंटेंट के जांच-पड़ताल तक की बात करने की बात की पर वहां तो समर्थन है पर इस टूल किट जांच-पड़ताल पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार हो रहा है।  कहा का यह दोहरा मापदंड है । वहीं ग्रेटाथनबर्ग और दिशा पर्यावरण विद है तो इन्हे फिर पराली जलाने पर किसानों के खिलाफ बोलना चाहिए  ।   सरकार ने पराली जलाने पर जिस सजा का प्रावधान किया गया था उसका समर्थन करना चाहिए था।  फिर इस मामले पर कैसे चुप्पी शायद तुम्हारा पूरा आंदोलन ही अब तक कैसे खडा रहा समझ से परे है । जब अपने विषयों के बारे मे ही न मालूम हो तो ऐसे समर्थन की कया सार्थकता  ?  किसान आंदोलन को कितने लोगों ने अपने रोजगार और राजनीति का माध्यम बना लिया है।  इन्हे समझौते से ज्यादा आंदोलन को लंबे समय तक रखने की चिंता ज्यादा है । अभी उत्तर प्रदेश में और पंजाब मे चुनाव है तब तक इस आंदोलन की अंगीठी सुलगाये रखना चाहते हैं।  एक मध्यम वर्गीय और निम्न वर्ग के किसानों के लिए यह संभव है  ?   वहीं विपक्ष जब अब तक सरकार मे था तो किसानों की इतनी ही फिक्र थी तो उसी समय मांग पूरा देते तो आज का दिन तो नहीं देखना पडता ।  यह आंदोलन को पूरी तरह से किसानों के हाथ में जाने की आवश्यकता है।  जिससे इस आंदोलन का समाधान निकालने मे सहायता होगी । अन्यथा राजनीति की घुसपैठ से यह आंदोलन  अपने मकसद पर कामयाब होगा इसकी आशंका कम है । पुनः किसान और शासन किसी सम्मान जनक समझौते पर पहुंच कर इस आंदोलन को खत्म कर देश का माहौल ठीक करेंगे इसी आशा के साथ  । बस इतना ही डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ 

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