

दिल्ली पुलिस के संयम की तारीफ जितनी की जाए कम है । किसी भी आंदोलन मे सिर्फ पुलिस वाले ही घायल हो यह बहुत कम होता है तीन सौ से ज्यादा पुलिस वाले अपनी जान बचाते हुए खाई मे गिरने की तस्वीर पूरे देश ने देखी है । अगर एक भी पुलिस वाले का हाथ उठ जाता तो बवाल मच जाता। आज विपक्ष लाल किले को लेकर जो बात कह रहा है वो कोई मायने नहीं रखता। जिस जलियांवाला बाग की कामना कुछ लोग किये हुए थे । जिससे सरकार बदनाम भी हो जाती और राजनीति क फायदा भी मिल जाता । पर दांव ही उल्टा पड गया। सरकार के संयम के चलते यह तथाकथित किसान आंदोलन भी लाल किले के प्रकरण को लेकर देश में बदनाम हो गया । जो थोड़ी बहुत भी जो समर्थन था वो भी खत्म हो गया। वहीं दूसरी तरफ आंदोलन के नाम से जो अराजकता फैलाने का काम बहुत षडयंत्र पूर्वक किया जा रहा था उससे अब जनता भी परेशान हो गई है । यही कारण है कि आसपास के गांव वाले आंदोलन को खत्म करने के लिए तंबू उखाड़ने सडकों पर आ गए है । लोगों मे इतनी नाराजगी कि उनके संयम ने भी जवाब दे दिया। वहीं ध्वज मामले में भी लोगों की दिलों की भावनाओं को ठेस पहुंची है। अब किसान नेताओं को भी लगने लग गया कि अब आंदोलन मे जन समर्थन नहीं रह गया है। इसीलिए कुछ संगठनों ने आंदोलन से अपने को अलग कर लिया है। वहीं इस ट्रेक्टर रैली मे जो लिखित वायदे से हटने के कारण दिल्ली पुलिस ने भी कई धाराओं में अपराध पंजीबदध किया है। अब किसान नेताओं को इस कानूनी कार्रवाई का भी सामना करना पड रहा है। यह भी इनके लिए चिंता का विषय है । वहीं कुछ दल नहीं चाहते कि यह आंदोलन वापस हो । क्योकि पूरी राजनीति इस पर निर्भर है पर मंसूबों पर पानी फिर रहा है । पर मै उन पुलिस अधिकारीयों और जवानों के विषयों मे आऊं जिन्होने वर्दी पहनकर उसकी शान बढाई है। हाथो पर लाठी कुछ के पास आधुनिक शस्त्र होने के बाद भी इन लोगों ने सिर्फ आदेशों मे ही बंधे रहे । पर न किसी किसानों को न आम आदमी को कोई चोट आई पर खुद जख्मी हो गये । इन लोगों ने अपने कारण आंच नहीं आने दी । अब किसान नेताओं की जवाबदेही तय हो रही है। अगर वो गणतंत्र दिवस के अपने ट्रेक्टर रैली पर अडिग नहीं रहते तो आज उनका यह आंदोलन जारी रहता पर एक भूल ने या जिद्द ने आंदोलन को ही धराशायी कर दिया। किसान आंदोलन के एक नेता का रोना यह दिखाता है कि अब जो स्थिति निर्मित हुई है उसकी उनहोंने कल्पना तक नही की थी । यह जरूर है कि इस आंदोलन मे कोई ऐसे सर्वमान्य नेता की कमी हर समय खली जिससे यह आंदोलन अपने मुकाम पर पहुंच सके । अलग अलग नेताओं के कारण वार्ता मे कोई न कोई उलझनें बनीं रहती थी । हर संगठन का कोई न कोई राजनीतिक आंका उसे हल तक नहीं पहुंचने देता था । यही कारण है कि वार्ता में कोई न कोई नई मांग देखने को मिल जाती थी । यही कारण है कि वार्ता ग्यारह दौर चली पर कोई अपने मुकाम तक नहीं पहुंच पाई । मामला अब देश के सर्वोच्च न्यायालय मे है । पर यह तय है आंदोलन अपने परिणित मे पहुचेगा इसकी आशा बहुत कम है । वहीं आगे भी किसान इस तरह के आंदोलन में शामिल होने के लिए दस बार सोचेंगे। जैसे खबरें आ रही हैं कि कुछ किसान इसे वापस लेने के पक्ष में नहीं है। पर इनकी संख्या कम है । देखो आगे क्या होता है। बस इतना ही डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ




