स्वतंत्रता दिवस निकल गया । पर आज के दिन की खबरें सोशल मीडिया में खूब चल रही है । पर इस त्यौहार मे किसी का भी बडा दिल नहीं देखा । हर वयक्ति के अपने कद के हिसाब से स्वतंत्रता दिवस को मनाते देखा गया । हाथ मे तिरंगा लहराते लिए हर वयक्ति अपनी देश भक्ति दिखाते हुए नजर आ जाता है । पर आम तौर से झंडा वंदन का सौभाग्य कुछ लोगों को ही प्राप्त होता है । आम तौर पर इस पर कॉपीराईट विगत चौहतर साल से तय हुआ है । आमतौर पर सबसे ज्यादा इस पर नेताओं का ही अधिकार ज्यादा रहता है । पार्षद से लेकर विधायक सांसद हर जगह इनके ध्वजारोहण और देश और आम नागरिकों के लिए मुफ्त में देश सेवा की सलाह । यह नजारे पूरे देश के रहते है । जो आगे चलकर एक तथाकथित रिवाजों मे बदलकर रख दिया गया है । इन नेताओ के साथ इनके काफिले इस कार्यक्रम में भव्यता लाने की अपने तरफ से पूरी कोशिश करते हैं । वहीं कार्यालयों में वहां के मुखिया और स्कूल कालेजों में वहां के प्राचार्य यह काम करते दिखाई देते है । वहां भी चम्मच जैसे कर्मचारी भी वैसे ही दृश्य पैदा करने मे अपने तरफ से कोई कमी नहीं छोडते । पर मै वहां आ रहा हू जिनको हम यह सम्मान देने की क्यो नही सोचते जो अपने शहर की कसबो की गांवों की सेवा करते है । मै उन कर्मचारियो की तरफ़ जा रहा हू जो कैसा भी मौसम हो अपने करतवय से नही चूकते । अगर हम स्वच्छ वातावरण मे श्वास ले पा रहे है तो यह उन्ही की मेहरबानी है । मै उन लोगों की बात कर रहा हू जिनके योगदान को हमने हर समय हल्के में लिया है । अगर एक दिन कोई विधायक सांसद पार्षद या कोई नेता अपने काम मे न आये तो कोई भी तकलीफ नहीं आयेगी । मतलब कोई कमी महसूस नहीं होगी । पर एक दिन कोई आफिस का चपरासी या शहर के गांवों के सफाई कर्मचारी न आये तो उस दिन इनका क्या महत्व होता है इससे प्रभावित होने वाला ही समझता है । चाहे आफिस हो या सार्वजनिक समारोह मे कम से कम इनके उन हाथों से ध्वजारोहण कराकर कम से कम इनको सम्मानित करने की परंपरा पर विचार किया जाना चाहिए । ऐसा करने से इन लोगों को अपने किये हुए सेवा पर गर्व महसूस होगा वहीं अपने काम को करने मे एक अलग आनंद का अनुभव होगा । आज हम कोविड 19 के महामारी से लड रहे है ऐसे परिस्थतियो मे भी इन लोग अपने काम को अच्छे से अंजाम देने में लगे हुए हैं । यह जरूर है हमको अच्छे माहौल में रखने और देश प्रदेश को भी स्वच्छ इन्ही के बदौलत पा रहे है । चाहे स्व. दीनदयाल उपाध्याय जी हो इनका सपना या प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का सपना हो अंतिम छोर तक पहुंचने की यह छोर का हिस्सा यह लोग ही है । अगर ऐसा हुआ तो तिरंगा की शान बढा जाएगी । जिस स्वच्छ भारत की कल्पना जिस स्वच्छ शहर की कल्पना हम लोगों ने बनाईं है यह इन लोगों के अथक परिश्रम से ही संभव है । चाहे साहेब के आने के एक घंटे पहले आने वाला और एक घंटे बाद जाने वाला शख्स हो या सबेरे पांच बजे से अपने हाथों में शहर के सडकों को बाजार को साफ करते हुए वो शख्स जो हमारे द्वारा किये हुए गंदगी को अपना काम समझते हैं । तो मेरा मानना है कि इनका काम हमारे काम से काफी बडा है । बस एक बार इनकी हौंसला अफजाई तो बनती है । देखो यह परिवर्तन कब आतां है । पर हमारे मे इतना नैतिक साहस और वो क्षण खोने की हिम्मत है यह उत्तर ही इसका प्रश्न है । पर परिवर्तन के लिए यह प्रयोग किया जा सकता है । हर बडे महापुरुषों का सपना यही तो है । बस एक बार यह कोशिश करके देखें और उसके बाद के नतीजे देखे मै यह कह सकता हू इनमे एक नई जान आ जाएगी । यह लोग ड्यूटी को सेवा समझने लगेंगे । स्वच्छता इन्ही लोगों के कंधों मे है । बस इतना ही डा .चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ
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