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कोरोना वैक्सीन को लेकर अफवाहों का दौर फिर से हुआ शुरू, सोशल मीडिया पर टीके को अप्राकृतिक बता उड़ा रहे अफवाह

नई दिल्ली: COVID-19 से बचाव में mRNA वैक्सीन बेहद प्रभावी हैं और दुनियाभर में लाखों लोगों ने ये टीकें लगवाए हैं. बता दें कि ये टीके कृत्रिम रूप से तैयार किए जाते हैं, यानी इन्हें किसी जीवित कोशिका के बाहर निर्मित किया जाता है. इसलिए सोशल मीडिया पर इन्हें लेकर अफवाहों का बाजार गर्म है. दावा किया जा रहा है कि टीके अप्राकृतिक हैं और आगे चलकर हमारे शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं. अब सवाल यह है कि क्या वाकई mRNA टीके लगवाने में जोखिम है?

18वीं शताब्दी के मध्य में एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) ने चेचक का टीका विकसित किया था, जो इस क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुआ. इसके बाद से मानव शरीर में संक्रामक रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता उत्‍पन्‍न करने के लिए कई तरीकों से इन टीकों का निर्माण किया जा रहा है. 20वीं सदी में निष्क्रिय विषाणुओं का उपयोग कर बड़ी मात्रा में टीकों का उत्पादन हुआ. इसी तरह कई टीकों को निर्माण के लिए मुर्गी के अंडों की सहायता ली गई, परिणामस्‍वरूप अंडे से एलर्जी वाले लोगों को इन टीकों से समस्या हुई. कुछ नवीनतम टीके, जैसे AstraZeneca COVID-19 वैक्सीन आदि कोशिकाओं में निर्मित किए जाते हैं. जबकि कुछ अन्य टीके जैसे कि Hepatitis B के टीके, बैक्टीरिया के भीतर बनाए निर्मित किए जाते हैं.

mRNA एक अस्थायी आनुवंशिक निर्देश है, जो हमारी कोशिकाओं को एक विशेष प्रोटीन बनाने के लिए प्रेरित करता है. यह mRNA बहुत हद तक वैसे ही कार्य करता है जैसे हमारी कोशिकाएं अपना mRNA बनाती हैं. mRNA टीके सिं‍थेटिक रूप से निर्मित किए गए पहले टीके हैं. इसमें प्रोटीन के लिए आनुवंशिक कोड के साथ एक केंद्रीय भाग होता है और दोनों तरफ छोटे हिस्से होते हैं, जो कोड को पढ़ने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं. mRNA टीके प्रतिक्रिया वाहिकाओं में बनाए जाते हैं. इस प्रक्रिया में पहले mRNA बनाया जाता है कि फिर उसे तेलीय परत में लपेटा जाता है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार मानव शरीर की कोशिकाओं में मौजूद mRNA लिपिड की परतों से ढंके होते हैं. mRNA बनाने के लिए, 1970 के दशक में खोजी गई विधि का उपयोग किया जाता है, जिसे ‘ट्रांसक्रिप्शन’ के रूप में जाना जाता है, जहां एक डीएनए टेम्प्लेट की प्रतिलिपि बनाई जाती है, जिससे आनुवंशिक अनुक्रम का एमआरएनए संस्करण बनता है. यह एमआरएनए उत्पादन बहुत कुछ वैसा ही होता है जब हमारी कोशिकाएं अपना एमआरएनए बनाती हैं. तैलीय कोट भी कृत्रिम रूप से बनाए जाते हैं और हमारी कोशिकाओं में लिपिड के समान होते हैं.

सिंथेटिक का अर्थ है किसी पदार्थ या यौगिक रसायन को संश्लेषण द्वारा बनाया जाना, विशेष रूप से किसी प्राकृतिक उत्पाद की तरह कार्य करने वाला उत्पाद बनाने के लिए. लेकिन हमारे लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि रासायनिक दृष्टिकोण से, कोई भी यौगिक समान होता है, चाहे वह किसी जीवित जीव द्वारा कोशिका के भीतर बनाया गया हो या प्रयोगशाला में. अत: प्राकृतिक तरीके से बनाया गया हो या रसायनिक तरीके से, दोनों ही स्थितियों में व्‍युत्पन्‍न यौगिक समान कार्य करेंगे. 


 

यह समझ उन्नीसवीं शताब्दी में तब विकसित हुई जब ‘जीववाद’ की अवधारणा को चुनौती दी जा रही थी. जीववाद इसका समर्थन करता है कि अकार्बनिक पदार्थ से कार्बनिक पदार्थ नहीं बनाया जा सकता है, लेकिन हम जानते हैं कि अब ऐसा नहीं है. फ्रेडरिक व्हीलर ने अपने एक क्लासिक एक्सपेरिमेंट में अमोनियम सायन्यूरेट नामक एक रसायन को गर्म करके यूरिया (हमारे शरीर द्वारा निर्मित और मूत्र में पाया जाने वाला एक अणु) को संश्लेषित किया था. सिंथेटिक यूरिया प्राकृतिक यूरिया के समान था, भले ही उसकी सिंथेटिक विधि यूरिया के जैविक उत्पादन की तरह नहीं थी. 


 

हम इसके बारे में सोचते भी नहीं हैं, लेकिन हम में से कई लोग हर दिन बड़ी संख्या में सिंथेटिक अणुओं का सेवन करते हैं. विटामिन C की गोलियों में, उदाहरण के लिए, आमतौर पर सिंथेटिक होता है, लेकिन यह फिर भी काम करता है क्योंकि यह विटामिन C के समान है, जो हमें ताजे फल और सब्जियों से मिलता है. वास्तव में, हमारे द्वारा ली जाने वाले अधिकांश Dietary Supplements में कई सिंथेटिक होते हैं. कुछ सामान्य दवाएं, जैसे कि एस्पिरिन, प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले जैव-अणुओं का सिंथेटिक रूप है. अन्य पूरी तरह से सिंथेटिक अणु उदाहरण के तौर पर कृत्रिम स्वीटनर या सॉफ्ट-ड्रिंक्स का बड़े पैमाने पर सेवन किया जाता है. सॉफ्ट-ड्रिंक के एक कैन में इनकी संख्या सैकड़ों मिलीग्राम तक होती है. ये मात्रा mRNA वैक्सीन की डोज (30 से 100 माइक्रोग्राम के बीच) की तुलना में काफी ज्यादा है. 

हालांकि mRNA टीकों के घटक हमारी कोशिकाओं के घटकों से काफी हद तक समान हैं, फिर भी इनके मध्‍य कुछ अंतर हैं. mRNA लिंक्ड बिल्डिंग ब्लॉक्स या न्यूक्लियोसाइड्स की एक श्रृंखला है. अधिकांश एमआरएनए वैक्सीन बिल्डिंग ब्लॉक्स – एएस, जीएस और सीएस जो एमआरएनए जेनेटिक कोड बनाते हैं – वे हमारी कोशिकाओं के समान होते हैं, और इन्हें मूल रूप से यीस्‍ट से निष्‍कर्षित किया जाता है. चौथे बिल्डिंग ब्लॉक, यू को mRNA को और अधिक स्थिर बनाने और हमारी कोशिकाओं को इसे तुरंत तोड़ने से रोकने के लिए N1-मिथाइलस्यूडॉरिडाइन नामक एक घटक के साथ बदल दिया जाता है. यद्यपि यह घटक सामान्य रूप से हमारे एमआरएनए में नहीं पाया जाता है, यह संशोधित बिल्डिंग ब्लॉक कुछ आर्किया, सूक्ष्म जीवों में पाया जाता है जो पृथ्वी पर अत्यधिक गर्म वातावरण में पाए जा सकते हैं, लेकिन हमारे Guts में और Belly Buttons में भी मिल सकते हैं. 


 

वैक्सीन mRNA अपेक्षाकृत जल्दी खराब हो जाता है, ठीक उसी तरह जैसे हमारे शरीर में पाए जाने वाले एमआरएनए स्‍वत: क्षीण हो जाते हैं. अलग-अलग एमआरएनए बिल्डिंग ब्लॉक्स को हमारे शरीर के सेल रीसाइक्लिंग सिस्टम द्वारा बचाया जाता है और नए एमआरएनए बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि अन्य भाग मूत्र में उत्सर्जित होते हैं. इसलिए, कुछ दिनों के बाद, हमारे शरीर में किसी भी mRNA वैक्सीन के बचे रहने की संभावना नहीं है. लेकिन यह हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को SARS-CoV-2 को पहचानने और COVID-19 के गंभीर लक्षणों को रोकने में सक्षम करने में कारगर साबित होगा.


 

दरअसल, एमआरएनए के टीके को कोशिकाओं के बाहर पैदा करने की क्षमता एक महत्‍वपूर्ण और नवप्रवर्तनकारी तकनीक है. इसके चलते कोशिकाओं, या रोगाणुओं को विकसित करने की आवश्‍यकता समाप्त हो गई है और टीकों का उत्‍पादन पहले से सरल हो गया है. वहीं दूसरी ओर, संश्लेषण की प्रक्रिया की अपनी जटिल तकनीक है, लेकिन आशा है कि भविष्‍य में इस तकनीक के माध्‍यम से टीके बनाने की प्रक्रिया भी आसान बना दी जाएगी. इतना ही नहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने विश्‍व के सभी देशों से एमआरएनए वैक्सीन बनाना सीखने का आह्वान भी किया है. 

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