एक पुरानी कहावत है कि भगवान लोगों को कभी भी अदालत के दरवाजे या कभी चिकित्सालय के दरवाजे कभी न दिखाए । यह जरूर है कि हास्पीटल से तो एक समय बाद निजात मिल जाती है । पर यह भी सच है कि कोर्ट का पीछा तो लंबे समय तक या जिंदगी भर साथ नहीं छोड़ता। पर जिंदगी का यह भी सत्य है कि दोनों से पाला तो पडता ही है। एक मे इलाज के लिए तो दूसरे मे न्याय के लिए जाना पडता है ।इसमें एक बात सामान्य है कि दोनों से परिजन जहां परेशान होते हैं वही आर्थिक रूप से कितनी चोट लगेगी यह बताना भी बडा मुश्किल है। एक बात यह भी सत्य है कि दोनों निम्न व मध्यम वर्गीय लोगों से पहुंच के बाहर है । जहां न्यायालय मे दरवाज़े के बाहर दिन भर खडा बाहर आदमी अपना इंतजार करते रहता है वहीं किसी केस में या कभी कभी अपने प्रतीक्षा के लिए चिकित्सक के कमरे के बाहर लोग अपनी बारी का इंतजार करते रहते है । कमरे के बाहर हर आने जाने वाले को देखकर किसी तरह अपना समय व्यतीत करना रहता है । वही दोनों जगहों मे एक बात सामान्य रहती है वो है कोई परिचित मिल जाए तो अरे यहां कैसे ? मतलब साफ है कि अस्पताल में दिखने से बिमार वहीं न्यायालय मे दिखने से कोई केस चल रहा है। दोनों मे एक बात फिर सामान्य है बडे लोगों के लिए पैसे वालो के लिए दोनों जगह प्रतीक्षा की आवश्यकता नहीं रहतीं। बल्कि यहां इनके स्वागत के लिए पलक पांवडे बिछाए खडे नजर आते है । यहां तो डेट भी इनके मुताबिक ही मिलती हैं। आइए स्टाफ की बात करे दोनों जगह सामान्य आदमीयो को एक उपेक्षित सा ही व्यवहार मिलता है वहां तो इनकी कीमत नहीं समझी जाती है ।
है या कहा जाए तो कोई सीधे मुंह बात नहीं करता । जिस तरह अदालत में कोई भी बंदा वकीलों को इधर से उधर वहीं चिकित्सकालय परिसर मे डा . को इधर से उधर देखते रहता है । दोनों जगह एक बात सामान्य है कभी भी बडा वकील और बडे डा . अकेले जाते नहीं दिखते उनके आगे पीछे जूनियर्स का लाव लशकर तो कहीं मुवककिल के चिंतित परिजन तो कहीं पेशेंट के चिंतित परिजन उनसे बात करने की कोशिश मे उनके काफिले की व्यवसायिक भाषा में महत्व या कहा जाए रौनक बढाते है । दोनों जगह एक सी खासियत यह है कि जितना बडा डा . और जितना बडा वकील उतनी बडी फीस और दोनों जगह लोगों के लिए समय की कमी। अगर गौर किया जाए दोनों जगह एक पहली मुलाकात में जूनियर के सामने ही अपनी बात रखनी पडती हैं। आगे फिर यह लोग गौर करते है । फिर किसी भी मामले को समझाने का तरीका भी एक समान रहता ज । जहां डा . अपने लैंग्वेज में समझाता है जो मोटा माटी पेशेंट को समझ नही आता वहीं वकील पूरी कानूनी व्याख्या कर समझाता है जो मुवककिल को समझ नहीं आता है। दोनों जगह एक ही बात रहती हैं कि ठीक हो जाए । वहीं कहीं दोनों जगह एक सा सुनने को मिलता है। एक सिविल केस मे वकील साहबान ने अदालती फीस काफी ज्यादा पटवा दी फिर उसी केस में दूसरे वकील साहब ने कहा इसकी तो कोई आवश्यकता ही नहीं थी । मैंने तो बगैर फीस पटवाये कर देता । वहीं कभी-कभी इस आपरेशन की तो आवश्यकता ही नहीं थी यह तो बेवजह कर दिया गया है। यह तो दवाई से ठीक हो जाता था। यहां एक बात साफ है कि दोनों जगह यह नहीं बताया जाता कि कितना पैसा लगेगा । दोनों जगह एक बात समान है काम चालू होने के पहले अपनी सुरक्षा के लिए दस्तखत ले लेते हैं। हालात ऐसे रहते है पढा लिखा वयक्ति भी बगैर पढें दस्तखत कर देते है । एक बार गौर करने लायक है सफलता के बाद इसमे से कई लोग राजनीति भी ज्वाइन कर लेते है। चिकित्सक के लिए आपातकालीन स्थिति सामान्य सी बात है पर यहां भी संवेदनशील मामले को लेकर ऐसी स्थिति एक बार तो बन ही चुकी है । डा . के लिए ड्रेस कोड है तो वकील के लिए भी ड्रेस कोड है। चलो मुद्दे पर इन दोनों क्षेत्रों में थोड़ी विभिन्नता भी है । अगर एक छोटा चिकित्सक जब बडे चिकित्सक के पास या स्पेशलिसट के पास भेजता है तो चिकित्सक उसका उपचार कर देता है। पर यहां जैसे मैंने देखा है कि अगर निचली अदालत ने कोई फैसला दिया इसके खिलाफ जब उपर की अदालत मे जाया जाता है तो कभी कभी अदालत पुनः निचली अदालत में जो बिंदु छूट गये रहते है उस पर विचार करने पुनः वहां भेज देती है । पर इसमें सामने वाले का बहुत समय खराब होता है । आम आदमी चिकित्सक से किसी भी बीमारी मे पलक झपकते ही निदान और राहत चाहता है । वहीं यहां न्याय पालिका को तो निर्णय देने मे सालो लग जाते है । एक तरफ किसी मानवीय भूल के कारण से गलत चिकित्सा मे जहां जवाबदेही तय होती है वहीं कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट मे कार्यवाई भी कर दी जाती हैं। वहीं न्यायालय मामले मे किसी पर भी अन्याय पूर्ण स्थिति मे कोई जवाब देही तय नहीं होती । एक तरफ कुछ घटना घटने से तोड़ फोड़ या चिकित्सक के साथ मार पीट तक करने का दुःसाहस कर दिया जाता है वहीं कानूनी हलकों मे रोष को हल्क मे लेकर चुप्पी साध ली जाती है। चिकित्सक के साथ बिल को लेकर झड़प सामान्य सी बात है वहीं मिनटों में लाखों रूपये की सलाह या अदालत मे खडे होने पर महंगे वकील पर कभी भी कोई बोलने की हिम्मत नहीं करता। या वहां कोई प्रदर्शन तक नहीं करता । अंत मे एक बात फिर सामान्य जहां गंभीर मरीजो को नहीं बचाने के लिए साॅरी वहीं केस हारने के बाद साॅरी शब्द सुनना ही पडता है । बस इतना ही
डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ



