आलेख – किससे लड़ोगे भाई जब घर बैठा शख्स ही दीमक की तरह चांट रहा हो

आज मानसिंह जयचंद की आत्मा भी बड़ी खुश हो रहीं होगी कि उनके द्वारा लगाया पौधा आज विचारधारा का ही रूप ही ले लिया है। आज तो यह वट वृक्ष बन चुका है । किससे लडोगे जब घर मे बैठे ही लोग दीमक की तरह खोखला कर रहे है। बाहर से तो लडा जा सकता है पर अपने तो उससे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। चलो आज की सरकार राष्ट्रवादी है गलत है । आप लोग तो धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार थे । फिर आप लोगों की सरकार के समय क्यो चीन युद्ध हुआ भाई भाई थे फर्ज किसने नहीं निभाया ? चलो आज ही चवालीस हजार किलोमीटर की जमीन वापस लाकर दिखला दो ? राजनीतिक रूप से घुटने टेकने वाले ही शांति आदि की बात कर रहे है जो शोभा नहीं देता । चलो पैंसठ में ही आया जाए क्यो युद्ध किया गया भाई आपकी सरकार थी यही आपके पसंदीदा अवाम था क्यो युद्ध हुआ फिर उस ताशकंद समझौता की कीमत स्व. लालबहादुर शास्त्री जी की जान देकर चुकानी पड़ी। फिर वही सरकार फिर वही पार्टी वहीं अवाम सन उननीस सौ इकहततर क्यो युद्ध हुआ भी यह ज्ञान उस समय नहीं था जो आज मोदी जी की सरकार को दे रहे है । क्या कारण है कि उस समय इस पाकिस्तान के टुकड़े करने वाले और गर्व करने आज उसी पाकिस्तान के साथ गलबहियाँ कर रहे है क्या उन्हे यह बात याद नहीं थी यह बतायें कि उस समय कौन गलत था । अगर पाकिस्तान शांति पसंदीदा देश है तो गलती तो फिर इनके ही दल की है जिन्होंने उस समय उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया था । बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। या तो पहले यह तय कर ले कि पाकिस्तान सही था तो उस समय कि इनकी सरकारे और नेता गलत थे । फिर इनके ही सरकार के समय देश भर मे आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने पर इन लोगों ने भर्त्सना करने के सिवाय कुछ नहीं किया। सिर्फ इस देश के निर्दोष लोगों के जान जाने पर मूक दर्शक बन कर बैठे हुए थे । पता नहीं कैसे जमीर नहीं जागा । इनके शासन मे आतंकवादी घटनाओं मे इतनी मौत के बाद भी उसी पाकिस्तान के साथ इनके यह संबंध यह दिखाते हैं कि देश और लोगों के असमय आतंकवादी घटनाओं मे होने वाले मौत से ज्यादा इनके लिए इनकी राजनीति महत्व पूर्ण है । मोदी जी को आए तो मुश्किल से सिर्फ सात साल ही हुए क्यो नही साठ सालों मे संबंध प्रगाढ़ कर लिया किसने रोका था ? आज हालात तो यह है कि सरकार को गिराने के लिए लोकतांत्रिक तरीके से काम करने की जगह पाक से मदद मांगने रहे गुहार कर रहे है शर्म तक महसूस नहीं हो रही है। इनहोने मान लिया है कि अब यह लोग अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। आज इन्हे अपने संवैधानिक संस्थाओं पर भी विश्वास नहीं रह गया है। अब तो हालात यह है कि बस इन लोग तो शारीरिक रूप से ही यहां रह रहे हैं पर मानसिक रूप से तो बाजू मे ही रह रहे है । जब भी देश का नुकसान इनके लिए मौका रहता है । कितनी विडंबना है कि एक भी पाकिस्तानी या चीनी नहीं मिलेगा कि वह भारत के लिए बोले पर उनके खैरखवाह की तो यहां पूरी फौज ही मौजूद हैं । इनका अस्तित्व ही उस पर निर्भर है । अब यह लोग ऐसा बोलने व कहने के पहले देश से व पाकिस्तान से माफी मांगे कि इनहोने और इनके नेताओं ने इनके देश के साथ गलत किया । मोदी जी ने तो कोई युद्ध भी किया सिर्फ आपके मतानुसार भी सिर्फ फर्जीकल स्ट्राइक किया वहीं अभिनंदन को भी बगैर कुछ किये सिर्फ गाल बजाकर वापस ले आया तो आप लोगों ने ही मोदी जी से ज्यादा नुकसान पाक को पहुंचाया। अब वह लोग डरे हुए हैं तो इसमें मोदी जी का क्या कसूर । जहां तक तीन सौ सत्तर धारा की बात है वह तो हमारे देश का आंतरिक मामला है अभी तो पीओके भी हमारा है । चलो विषय पर ही आया जाए अरे भाई पाकिस्तान वालों इनको समझ नहीं है तुम्हे तो समझ आनी चाहिए कि जिन लोगों ने तुम्हारे देश के दो टुकड़े किये है आज उनके साथ खडे हो अगर यह लोग मीरजाफर है तो आप लोगों का भी वही रोल है या तो आप लोगों को ऐसे लोगों के साथ खडा होना भी कैसे गंवारा हो रहा है जिन्होंने तीन युद्ध को अंजाम दिया नब्बे हजार सैनिकों को युद्ध बंदी बनाया जो विश्व में कहीं भी नहीं हुआ उनके साथ खडे हो थोडी सी तो शर्म होनी चाहिए थी। खैर आप लोगों के विचार एक है इसलिए ही यह खिचडी पकी है । पर आज जिन लोग फारूख अब्दुल्ला को मात्र अठारह महिने नजरबंदी में रखने पर लोकतंत्र के स्वतंत्रता की बात करने वालों को भी स्व. शेख अब्दुल्ला को सत्रह साल नजरबंदी रखने पर भी जवाब दे देना चाहिए । मोदी जी की सरकार ने अभी तक एक भी पाकिस्तानी को नहीं मारा जिन लोग काश्मीर के आतंकवादी घटनाओं मे शामिल थे पाकिस्तान ने अपने नागरिक मानने से ही इंकार कर दिया। वहीं अजमल कसाब पाक नागरिक था जिनसे आज मदद मांगने का काम कर रहे है क्यो फांसी दी । एक तरफ एनकाउन्टर करो और दूसरे तरफ आंसू बहाने का काम एक साथ नहीं चल सकता । कुल मिलाकर पाक यह तय ले उनके लिए कौन बेहतर है अब यह पाठक ही तय करे कि पाकिस्तान के साथ इन दलों ने भी न्याय नहीं किया । बस इतना ही डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ



