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विशेष लेख – आज संविधान दिवस है, पर संविधान क्या सबके लिए एक है ?

आज संविधान दिवस है। हम विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र होने का दंभ भरते है। पर संविधान क्या सबके लिए एक है ? या संविधान का आचरण या पालन हैसियत देख कर तय होता है। जिस संविधान के पालना की शपथ लेते हैं क्या वो शपथ पूरी तरह से निभाई जाती है। चलो आज इस पर ही चर्चा की जाए । राजनीति के लिए बाबा साहब अंबेडकर के संविधान की बहुत कसमे खाई जाती हैं। हर बार विधायिका मे बडे जोर शोर से अपने भाषण के लिए उपयोग भी किया जाता है। पर यह सिर्फ उस संविधान के मंदिर संसद और विधानसभा तक ही सीमित रहता है । जिस दिन इस पर इमानदारी से काम होगा जिस दिन इस पर भय मुक्त होकर काम होगा जिस दिन इस पर भ्रष्टाचार मुक्त होकर काम होगा फिर यह संविधान किस चिडिया का नाम है पता चलेगा। पर यह होगा और कब होगा कहना मुश्किल है । क्योकि जिन पर यह जिम्मेदारी है वो ही नहीं चाहते कि यह स्वतंत्र होकर काम करे । आज नेताओ से आम लोगों की उम्मीद भी खत्म हो गई है कि इस शपथ से चलेंगे। वैसे भी इनका एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप से देश भी हतप्रभ रहता है कि हो क्या रहा है ? कहा संविधान कहां शपथ इतनी भी नैतिकता नहीं रहती कि आरोप लगने पर पद त्याग कर एक आदर्श स्थापित करने की पहल करे । सिर्फ आज के समय श्री लालकृष्ण आडवाणी ने यह आदर्श दिखाया था । यह लोग तब तक इंतजार करते रहते है जब तक अदालतें इन्हे कनविक्ट करार न कर दे या दोषी करार न कर दे तब तक यह अपनी सियासत खेलते रहते है । एक बार अदालत के चौखट मे आने के बाद केस किस स्थिति में रहता है सबको मालूम है । तारीख पर तारीख चलते रहती है। कभी कोई बंदा यह नहीं कहता कि मेरे केस का निपटारा जल्दी हो जाये । हालात तो यह होते हैं कि मौत भी आ जाती है पर केस आगे नहीं सरकता। उल्लेखनीय है कि कोई दोषी क्यो चाहे कि उसके अपराधो पर त्वरित फैसला हो ? संविधान मे जो भी उल्लेखित है उस पर अमल करना और कराना विधायिका और न्यायपालिका पर निर्भर है । पर विधायिका मे यह काम कितने स्वतंत्रता से होते है इसमे ही संदेह है । राजनीतिक पहुंच व पैसा इनको अपने आखिर मुकाम तक पहुंचने ही नहीं देता। यही कारण है कि जेएनयू में लगे नारे लगाने वालो पर मुकदमा कायम करने के लिए अनुमति देने मे ही सालो लग गए । वहीं रिपब्लिक टीवी पर हुई कार्रवाई पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर संविधान पर चलने की बात कही गई है। पर क्या इन परिस्थितियों में एक आम आदमी के उपर कार्य वाही होती तो इतना शीघ्र इंसाफ मिल पाता ? या फिर इस इंसाफ को पाने के लिए हम इतना खर्च वहन कर पाते ? अगर हम संवैधानिक अधिकारों की बात करते है तो एक निश्चित समय पर किसी केस का निर्णय मिलना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। पर वो कहां मिल पाते है ? फिर न्यायालय की लेट लतीफी और वहां पर पैसों की अहमियत न्यायालय के कार्यो को भी प्रभावित करते हैं। मैंने इसे पास से देखा है । यही कारण है कि लोग अपराध करने से क्यो डरने चले ? जब किसी की फांसी चार पांच बार टले तो हमारे कानून में कितनी कानूनों पेचदगीया है यह साफ परिलक्षित होता है । शायद अपराधियों के कानूनी हक के चलते पीडिता के साथ नाइंसाफ़ी साफ नजर आती है। पर यह बात संविधान मे भी उल्लेखित किया जाए कि किसी को भी उसके केस पर फैसला उसके जीतेजी मिले । मृत्यु के बाद न्याय कहां न्याय कहलायेगा । यही कारण है कि दोषी वयक्ति इस कानूनी खामियों का इस्तेमाल करते हुए अपने फैसले को लंबित करवाने मे सफल होता है। वो यह कभी भी नहीं चाहेगा कि फैसला जल्दी हो । इसलिए बडे लोगों के उपर आरोप तय करने मे ही सालो लग जाता है। संविधान में हर नागरिक के संवैधानिक अधिकारों पर विचार करने की आवश्यकता है। पर यह कटु सत्य है कि आम आदमी इससे हर समय वंचित रहता है। पर उस अधिकार को भी आसानी से नहीं पाया जा सकता। महंगे वकील सिर्फ बडे लोगों को ही उपलब्ध रहते है और न्याय उनके लिए ही होता है । इस पर जितना लिखा जाए कम है । बस इतना ही
डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ

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