विशेष लेख – रवैय्या तकरीबन सभी दलो में यह बात आम सी है बात, जानें – cgtop36.com

डा.वाघ की वाल से आज अपनी बात पर मै आप लोगो का ध्यान उस समाचार की तरफ खींचना चाहता हू जो आपके नजरो से मात्र एक समाचार बनकर निकल गया । पांच राज्य के चुनाव हुए लोग अभी पूरी तरह से जहां खुशी न मना पाए हो वही कुछ लोग अभी दुख से भी न उभर पाये हो वही पार्टीयां अभी समीक्षा करने मे लगी हो मतलब लोग चुनाव के बाद के माहौल से उभरे नही है । वही एक समाचार ने की उत्तर प्रदेश के दो नव निर्वाचित विधायको ने इस्तीफा दे दिया । इसके बाद आम आदमी पार्टी के जिनके नाम से पंजाब मे पार्टी ने चुनाव लडा श्री भगवंत सिंह मान ने भी लोकसभा से सांसद पद से त्यागपत्र दे दिया है । उत्तर प्रदेश मे भी चुनाव का रिजल्ट आया पुनः भाजपा सत्ता मे आई तो पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव व श्री आजम खान ने भी विधायक पद से इस्तीफा दे दिया क्योंकि चुनाव के नतीजे इनके मन के अनुरूप नही थे । यह कोई चुनाव जनता के लिए तो लड नही रहे थे ये तो मुख्यमंत्री पद के लिए चुनाव लड रहे थे । पहली बात तो योगी जी भी विधानसभा का चुनाव लड रहे थे तो इन्हे भी अपने दल व गठबंधन को तो यह दिखाना इनकी राजनीतिक मजबूरी थी की यह भी चुनाव जीत कर मुख्यमंत्री बनने के रेस मे है । इससे इनके दल व गठबंधन को एक नैतिक उर्जा मिलती । पर चुनाव मे आशातीत सफलता न मिलने से अब इनके पास जो राजनीतिक विकल्प थे उसमे कौन सा बेहतर है अब यह चुनने लगे । अंत मे श्री भगवान सिंह मान ने जहां मुख्यमंत्री बनने के लिए अपने लोकसभा से त्यागपत्र दे दिया वही इन दोनो ने विधानसभा से त्यागपत्र दे दिया । राजनीति करना सेवा है या राजनीति पहले यह तय करना जरूरी है । मै यह समझ नही पा रहा हू लोकतंत्र के नाम से चलने वाले इस खेल का खर्चा इस देश का आम आदमी क्यो उठाये । पहले जब आप पांच साल के लिए चुने जाते है तो वहां के मतदाताओ के माननीय रहते है आप शपथ लेते है । जब आप चुनाव लडते है तभी यह पता रहता है की उस क्षेत्र की पांच साल सेवा करना है । फिर जब आपको मालूम है की ढाई साल बाद उत्तर प्रदेश के चुनाव है और आप भी संभावित मुख्यमंत्री के चेहरे मे से एक है यह भी आपको ही अपने दल से घोषणा करना मात्र एक औपचारिकता मात्र की बात थी । फिर राजनीतिक व्यवहार तो एक आने वाले मुख्यमंत्री का भी अहसास कराता था । मै विषय मे आऊं ऐसे स्थिति मे लोकसभा चुनाव लडकर सांसद बन गए पर उनका लक्ष्य मुख्यमंत्री था इसलिए विधानसभा चुनाव लडा और जीता पर बहुमत न मिलने के कारण अंत मे विधायक पद से इस्तीफा दे दिया । आखिर एक पद से त्यागपत्र तो देना ही था । पर इस लोकतंत्र के खेल मे इसका खर्चा यह देश क्यो उठाए। यह खर्च या तो दल दे या फिर उस जनप्रतिनिधि से पूरी तरह से वसूला जाए जिसने अपने क्षेत्र के मतदाताओ को भरोसा दिया था की वह इस क्षेत्र का पांच साल तक प्रतिनिधित्व करेगा । फिर इनके राजनीतिक महत्वाकांक्षाओ की कीमत देश व आम नागरिक के टैक्स का पैसा क्यो वहन करे यह किसी एक दल की बात नही है । यह रवैय्या करीब करीब सभी दलो मे यह बात आम सी है । इस लेख के माध्यम से मेरा चुनाव आयोग से अनुरोध है की कोई व्यक्ति किसी सदन का सदस्य है तो मध्य मे होने वाले चुनाव मे उसे लडने की अनुमति नही देना चाहिए। अगर इसके बाद भी वह लडना चाहता है तो उससे पूरे संभावित खर्च पहले ले लेना चाहिए। इससे लोकतंत्र मे इनके इस तरह के राजनीतिक खेल पर बंदिश लगेगी । वही दूसरी बात यह की जब जेल मे बंद नेताओ को जिनकी जमानत नही हो रही है यह लोग जनप्रतिनिधी बन भी जाए तो उस क्षेत्र को क्या फायदा होगा । दुर्भाग्य से इन दलो को मालूम होने के बाद भी इन्हे माननीय बनाकर एक तरह से कानूनी कवच प्रदान करने से ज्यादा कुछ नही है । मेरे इस लेख को चुनाव आयोग व सरकार व न्यायपालिका जरूर संज्ञान लेगी और आप जैसे सफग पाठको का सहयोग व मुखर आवाज जरूर हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे । कल अपने वाल मे काश्मीर फाइल्स के राजनीतिक पर बहुत अच्छा लेख पढने का इंतजार करिये ।
बस इतना ही
डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ



