चाइना का कोरोना वायरस : यह किसी युद्ध से बिलकुल भी कम नहीं है – प्रभाकर पटनायक
जब यह दौर बीत जायेगा, तभी समग्र आकलन हो सकेगा कि चाइनावायरस ने जान-माल की कितनी क्षति की। अभी ही जितने संकेत दिख रहे हैं…तबाही साफ दिख रहा है।अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने आज कह ही दिया कि यह 2008-09 से बड़ा आर्थिक संकट साबित होने वाला है। सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने घुटने टेक दिये हैं।
आर्थिक मंदी अब एक ऐसा सच है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। इस साल वैश्विक अर्थव्यवस्था का आकार कम होना तय है। मूडीज ने अमेरिका की वृद्धि दर (-)2% रहने का अनुमान किया है। यूरोप को कोई बचा ही नहीं सकता है। यूरोजोन में जर्मनी को छोड़ दें तो बाकी लगभग सारे देश टूरिज्म, हॉस्पिटलिटी जैसे क्षेत्रों पर निर्भर हैं। चाइनावायरस ने सबसे पहले इन्हीं क्षेत्रों को बर्बाद किया है और सबसे बाद तक यही प्रभावित भी रहने वाले हैं।
भारत के संदर्भ में देखिये तो चाइनावायरस और प्रकृति, दोनों ही प्रतिकूल। कहां वृद्धि दर में सुधार तय लग रहा था, अब दो-ढाई प्रतिशत वृद्धि दर भी अतिउत्साह लग रहा है। सरकार ने आज किसानों और किसानी को भले ही लॉकडाउन से छूट दे दी है, लेकिन बेमौसम बारिशें अपना काम पहले ही कर चुकी हैं। रबी फसल में तिलहन पूरी तरह बर्बाद है, गेहूं खेतों से निकलकर घरों तक कितना पहुंच पाएगा…अनिश्चित है। जनवरी-अप्रैल के नुकसान की भरपाई में साल भर भी कम पड़ेगा।
जब भी विपदाएं आती हैं, नुकसान होंगे ही। प्रयास इस बात के होने चाहिये कि नुकसान को कम से कम किया जा सके। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में सरकारों और नागरिकों को एक-दूसरे का पूरक हो जाना पड़ता है, तभी नुकसान को कम कर पाना संभव होता है। आकस्मिक आपदाओं की पूर्व तैयारियां हमेशा ही कम साबित होती हैं। अमेरिकन ड्रीम, यूरोपियन ड्रीम…सारे बिखर रहे हैं।
पश्चिम का विकसित श्रेष्ठताबोध भी इस आपदा में असहाय है। विश्व का सरपंच भी बेदम है। ऐसे में सिर्फ सरकार से अपेक्षाएं लगाकर बैठ जाने से नुकसान बढ़ेगा ही। व्यवस्था की अपनी सीमाएं हैं, होनी चाहिये भी। चीन की तरह व्यवस्था के स्वयंभू हो जाने से पूरी मानव जाति खतरे में पड़ जाती है।
यहां इस देश में व्यवस्था ने लॉकडाउन किया, 21 दिन घरों से कम-से-कम निकलने को कहा। सरकार ने कहा कि जरूरत की सारी चीजें आपको मिलती रहेंगी, अनाज-दूध-फल-सब्जी-दवा सब मिलता रहेगा। हम दुकानों पर टूट पड़े, बोरा-बोरा अनाज भर लिये घर में। हममें से जो दुकान वाले हैं, उन्होंने देखा मौका और बीस के सामान का भाव चालीस कर दिया। हममें से कई ट्रेनों में ऐसे लदकर निकल पड़े, जैसे पटना या आरा-छपरा में हनुमानजी ने संजीवनी वाला पहाड़ लाकर रख दिया हो।
हममें से जो फैक्ट्री मालिक हैं, फैक्ट्री बंद होते ही मजदूरों को धकिया दिया। हममें से कई जो मकानमालिक हैं, डॉक्टरों तक को घर से भगाने लग गये। हममें से कइयों ने कूड़ा ले जाने वालों, घर में काम करने आती सहायिकाओं को पैसे देने से इनकार कर दिया। देश का प्रधानमंत्री हाथ जोड़कर कहता रह गया, कि पैनिक बाइंग मत करिये…सब जरूरी सामान मिलता रहेगा, कि मजदूरों-किरायेदारों के प्रति दयाभाव रखिये, कि घरेलू सहायिकाओं आदि के पैसे मत रोकिये। प्रधानमंत्री ने कह दिया, हमने सुन लिया, और हर वह काम किया जिससे मना किया गया था।
सरकार ने हाशिये के लोगों के लिये 1.70 लाख करोड़ रुपये का राहत पैकेज दिया। रिजर्व बैंक ने आज बैंकिंग प्रणाली में 3.74 लाख करोड़ रुपये डालने की बात की। तीन महीने तक हर प्रकार का ईएमआई टल गया, क्रेडिट कार्ड का भी
विभिन्न श्रेणी के लोगों को नकदी मदद की घोषणा हुई। रेपो दर कम होने से बैंकों को सस्ता कर्ज मिलेगा, और बैंकों को सस्ता कर्ज मिलेगा तो एमएसएमई-लोगों को भी सस्ता कर्ज मिलेगा। रेपो दर घटाये जाने के तुरंत बाद एसबीआई ने ब्याज दरें 0.75 प्रतिशत कम की है। बाकी बैंक भी आज-कल में करेंगे। सरकार और रिजर्व बैंक इतने पर नहीं रुक नहीं जाएंगे। हां, कितना भी कर लें…काफी नहीं होने वाला, यह भी तय है।
मुद्दा यह है कि नागरिक होने के नाते संकटकाल में हमने क्या किया? जबकि इस संकट में तो हमें बस इतना ही करना था कि अपने-आप को बचाने में सरकार का सहयोग करते।
जब युद्धकाल हो, आपदाकाल हो…देश-समाज को भी इसी भरोसे वाले मनोविज्ञान की जरूरत होती है। इसी भरोसे के दम पर रूसी लोगों ने हिटलर की अपराजेय सेना से वोल्गोग्राद में खिड़कियों-गलियों तक युद्ध किया था, और विजयी भी हुए थे। इतिहास के पास ऐसे असंख्य उदाहरण हैं।
सर्पदंश के मामलों में जहर फैलने से अधिक मौतें हृदयगति रुकने से होती हैं। यह भी युद्धकाल है। इसमें सकारात्कमता की जरूरत है। सांप कांट भी ले तो यह देख लीजिये कि वह जहरीला है भी या नहीं।
ऐसे समय में यदि वह जहरीला है तब भी जख्म कांट-छांटकर जहर निकालने की कोशिश तो करिये। ऐसे समय में सरकारों को जनता की मदद की जरूरत होती है। दो-चार सप्ताह का सब्र कर लेंगे, चाइनावायरस हार जाएगा, फिर पूरी उम्र पड़ी है ‘हाय तोबा’ करने के लिये।




