विदेश यात्रा संस्मरण 9- लोगों के आत्मनिर्भरता की झलक पेरिस में दिख जाती है सेल्फ सर्विस से

विदेश यात्रा का संस्मरण 9 – अब हम पेरिस के मुख्य मार्ग मे आ गए थे । बस आम शहरों जैसा ही शुरूआत मे लग रहा था । हमे यहां रुकना नहीं था । हमारे पहली यात्रा स्विट्जरलैंड की निर्धारित थी । पेरिस से स्विट्जरलैंड करीब छ सौ साठ किलोमीटर है । हमे निकलने मे बारह एक बज गया था । कुछ किलोमीटर चलने के बाद शहर भी छूट गया। हमारे यहां जैसे ही नजारे थे । एक तरफ से जाने वाले दूसरे तरफ से आने वाले । शहर निकलने के बाद महसूस होने लगा गया कि अब हम कहीं और है । पूरे रास्ते भीड़ भाड़ कम थी कभी कभार गाडिया दिखती थी । दोनों तरफ पेड हरियाली लिए हुए । सुखद यह था मैडम बाॅटनी की पूर्व लेक्चरर होने के कारण हमे इनके बाॅटनीकल नाम भी मालूम होने लगे । हमारे यहां किसी भी रास्ते पर निकल जाओ आपकी गाड़ी चलाने की अग्नि परीक्षा से कम नहीं रहती । यहां की खासियत पॉपुलेशन कम होने के फायदे यहां परिलक्षित होने लग गये थे। इक्का दुक्का गाडी ही दिखाई देती थी । रास्ते भर बातचीत व आमतौर पर कुछ नया दिखने पर एक दूसरे का ध्यान खींचा जाता था । करीब हम पेरिस से निकले हमे करीब दो घंटे हो गये थे । शायद एक सौ पचास किलोमीटर की यात्रा तय कर लिए होंगे। अब थोडी सी भूख का भी अहसास होने लगा था । अब यह तय कर लिया गया था कि कोई भी रैस्टोरेंट मिले अब कुछ देर के लिए रुकना है । हम लोग फिर रुके काफी बडे परिसर मे यह रैस्टोरेंट था । चारो तरफ हरियाली थी । वहीं पार्किंग तो इतनी ज्यादा थी कि क्या कहने । कहीं भी पार्क कर लो । जो हमारे यहां की बडी समस्या है । वहीं यहां की खासियत यह है कि आर्डर लेने के बाद वहां जमाये गये प्लेट चम्मच को लेकर हमे ही वहां से जाकर लेना पड़ता है कुल मिलाकर सेल्फ सर्विस कहा जाए तो बेहतर है । वहीं खाने के बाद वाश के लिए जहां जगह निर्धारित की गई थी प्लेट को वहीं छोड़ना था । वहीं पीने के पानी भी अपने हाथो से लेना था । ऐसा कर उसने अपने लेबर की संख्या भी कम कर ली । यहां हर तरह की वहीं पाश्चात्य डिश थी । वहीं ज्यादातर ब्रेड से बनी चीजे ज्यादा दिख रही थी । वहीं कोल्ड ड्रिंक की बोतलें चित परिचित लग रहीं थी क्योकि हम इन्हे यहां भी देखते रहते हैं। आर्डर बुक होने के बाद बनने पर आवाज देकर आपको अपना सामान लेकर आना रहता है। बस क्या था हम लोग भी लेकर आ गये । जहां कुछ लोग रैस्टोरेंट मे ही बैठे थे तो कुछ कार मे ही बैठकर तो कुछ लोग झाडो के नीचे बैठकर खाने का आनंद ले रहे थे । यह हमारी यात्रा का पहला रूकना था वहीं खाने मे क्या मिलेगा यह भी एक हमारे जानने के लिए कौतूहल था । पर अमूमन सब चीजें अपने देश भी उपलब्ध है थोड़ा बहुत परिवर्तन व स्वाद अलग होना लाजिमी है । हमने नाश्ता और काॅफी अच्छे से ले लिया जिससे आगे फिर हम कहीं भी न रुके यही सोच थी । यहां हमारा कब एक घंटे से ज्यादा निकल गया पता नहीं चला । अभी भी करीबन पांच सौ किलोमीटर की यात्रा तय करना बाकी था । इसलिए हम लोग अपने गंतव्य से आगे के लिए निकल पडे । क्रमशः बस इतना ही डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ




