विशेष लेख- माइक फेंकना कुर्सी फेंकना अब संसदीय हिस्सा बनकर रह गये है

आज डा.वाघ की वाल पर हम आज विपक्ष की भूमिका पर बात करेंगे । लोकतंत्र मे विपक्ष सरकार से ज्यादा सशक्त होना चाहिए यह सरकार पर नकेल कसने का काम करते है । किसी समय देश मे सशक्त विपक्ष हुआ करता था । उनके सदन मे दिये गए भाषण आज भी देश की धरोहर है । पर जो तप तपस्या से वे निखरे थे वो आज के नेताओ मे दूर दूर तक दिखाई नही देती है । सदन मे आने के पहले का होमवर्क उनके भाषण मे दिखाई देता था । हालात यह हो जाती थी की मुट्ठीभर विपक्ष सत्ता पर भारी पड जाते थे । कई बार तो मंत्रीयो को फाईल लेने घर तक जाना पड जाता था । अब यह लडाई संसदीय न होकर गुंडागर्दी मे तब्दील हो गई है । पहले देश मे सडक जाम कर लो फिर सदन के अंदर अपनी बांह ऊपर कर शौर्य ही दिखा दो । माइक फेंकना कुर्सी फेंकना अब संसदीय हिस्सा बनकर रह गये है । चलो मान भी जाए यह अग्निवीर स्कीम खराब है । किसने रोका रहा है इस विषय पर सरकार को विषय पर ही घेरा जाए देश के सामने इसके खामियो को रखकर अपने कदम वापस लेने के लिए बाध्य करना चाहिए था । उसकी जगह आग जनी पत्थर बाजी कर विपक्ष ने अपने दिवालियापन का ही परिचय दिया है । दुर्भाग्य से विपक्ष के नेताओ पर केस चल रहे है वही वह जमानत पर है । ऐसा कर वह सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे है की आज का युवा बेरोजगारी से बाहर आए या न आए पर उन लोग अपने इस संकट से उबर जाए यह पहला लक्ष्य है । जब से मोदी जी आए है देश को अस्थिर कैसे किया जाए वह भी हिंसक रूप से यह मंशा ज्यादा काम कर रही है । चुनाव मे खारिज होने के बाद विपक्ष ने रास्ता अख्तियार कर लिया है । सभी विपक्ष दलो के कद्दावर मंत्री जेल की शोभा बढा रहे है ।ये ही एक मार्ग है जिस पर चलकर अपने उद्देश्य को पूरा करना चाहते है । वही सबसे बडी उनकी परेशानी उनमे एकता का नितांत अभाव है । सब प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे है । इन नेताओ की महत्वाकांक्षाओ का यह हाल है जेब मे मुश्किल से दहाई अंक मे सांसद है और राज्य के बाहर कोई नही जानते यह लोग मोदी जी का विकल्प बनने की सोच पाले बैठे है। राष्ट्रपति चुनाव मे खडे किए गए उम्मीदवार पल्ला झाड रहे है । आज राजनीतिक हालात रह है जो हालत आज है वह कभी जनसंघ व भारतीय जनता पार्टी के लिए भी थी । पर उसके काडर ने मेहनत की आज सत्ता मे है । पर ऐसी पत्थर बाजी आगजनी नही की । यह लोग इंस्टैंट फूड जैसे प्रधानमंत्री पद चाहते है । देश मे इस तरह के हालात से आम लोग नाखुश है । ऐसे लोग बाग से उनका कोई लेना देना नही रहता है । कोई जरूरी नही की सरकार से हर बात पर सहमत हुआ जाए पर इसे वार्ता कर भी सुलझाया जा सकता है यही लोकतंत्र का तरीका है । फिर इस तरह के अलोकतांत्रिक तरीका अनुचित था वही इन नेताओ की मंशा को दिखाता है । इन दलो व नेताओ को समझना होगा जितना यह आगजनी को अप्रत्यक्ष समर्थन देंगे वैसे इनके सपने भी खाक होंगे । देश इन्हे रचनात्मक रूख मे देखना चाहते है दुर्भाग्य से यह कोसो दूर है । यह स्वंय सोचे स्व. राम मनोहर लोहिया स्व.मधु लिमये स्व.अटलबिहारी बाजपेई स्व.जगन्नाथ राव जोशी स्व.कुशाभाऊ ठाकरे स्व.टी.एन पई स्व. श्रीपाद अमृत डांगे स्व.हीरेन मुखर्जी स्व.सोमनाथ दा कितनो के नाम लिखू । यह लोग कहां खडे है विचार करे ?
बस इतना ही
डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ





