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आलेख – जापान की त्रासदी से खुद निकले थे लोग, ऐसे समय मे आपदा में अवसर करते लोग मानवता पर कलंक, जागो देशवासियों यह भयंकर आपदा काल की तरह ही है

मेरे अधिकांश विषय आपके ही चर्चा के दौरान प्लाट कर लेते है आज का मेरा विषय मेरे मित्र डा. अशोक सोनी के साथ हुई बातचीत के संदर्भ से निकला है  डा.अशोक सोनी ने जब यह बात कही तो मेरे को भी लगा कि यह बात आम लोगों के बीच मे पहुंचनी चाहिए पहलें एक बार मै लिख चुका हू कि देश हमारे लिए क्या कर रहा है उससे महत्व पूर्ण है यह है कि हम देश के लिए क्या कर रहे है शायद यह हमारे नजरिये का फर्क है। आज से करीब पंद्रह साल पहले जापान में एक भयंकर सुनामी आई थी पूरा जापान ही हिल गया था पर वहां के लोगों का राष्ट्रवाद उनकी ताकत होता है। वहां इसे किसी राजनीतिक चश्मे  से नहीं देखा जाता। सत्ता विपक्ष सब एक साथ सुनामी प्रभावितो को शासकीय शेल्टर में रखा गया।  शासन से किसी भी बात की आपत्ति नहीं सुनामी मे लोगों के घर उजड गये पूरे का पूरा शहर इस मंजर से तबाह हो गया पर  आम नागरिक ने किसी को भी नहीं कोसा और अपने नागरिक दायित्व का निर्वहन करने मे लगे रहे हालात यह थे कि लोगों को बहे घरों के सामान चाहे टीवी हो मोबाइल हो  या फिर सोने के आभूषण तक क्यो न हो जिनको जहां भी मिला किसी ने भी अपने पास नहीं रखा  उन्होंने जाकर सरकार के एजेंसियों के पास जमा कर दिये। किसी भी बंदे को लालच पैदा नहीं हुआ।  सरकार की कोशिश और नागरिकों के दायित्व ने उन्हे उस संकट से उबार दिया पर आज हमारे यहां भी कमोबेश यही स्थिति है पर हमारे यहां क्या हो रहा है किसी को भी नागरिक दायित्व की बात तो बेमानी है यहां तो संवेदनशीलता का ही अभाव है। जिसको जहां मौका  मिल रहा है जमकर फायदा उठा रहा है। कोई मानवता नहीं हालात तो यह है कि शव को ले जाने के लिए दस पंद्रह किलोमीटर का लोग पंद्रह हजार रूपये तक लेने के समाचार आ रहे है। एक समाचार पढा था कि बच्चा भूख से इतना बेहाल धा कि एक दूधवाले का दूध सडक पर गिर गया था उसे जानवरों जैसे पीने के लिए बाध्य था फिर वहां के कुछ लोगो ने फिर उस बच्चे को खाना खिलाया जिस फ्रंट लाइन वर्कर की हम तारीफ कर रहे है उसमे से कुछ लोग इंजेक्शन रेमडेसिविर का ब्लैक कर रहे है आक्सीजन ब्लैक कर रहे है क्या हो गया है। सिर्फ हर को पैसा चाहिए। वहीं वैक्सीन मे भी अपने राजनीति के लिए भ्रम पैदा करना इसकी किन शब्दो मे निंदा की जाए समझ से परे है वहीं अपने को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनाने वालो ने भी यही किया। सबको अपने दुकानदारी की फिक्र थी मानवता देश जाए मै यह शब्द उपयोग नहीं करता हू पर लिखने से नहीं रोक पा रहा हू भाड़ मे जाए। ऐसा भी नहीं है कि मानवता पूरी खत्म हो गई है इसमे कुछ सामाजिक और धार्मिक संगठन भी सामने आए पर जिस लक्ष्य को देश प्राप्त करना चाहता था। उससे वंह नहीं मिल पाया कुछ लोग तो अपने राजनीतिक फायदे के लिए देश को बदनाम करने से भी नहीं चूके। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश को कैसे बदनाम किया जाए उसी मूलमंत्र पर लगे हुए थे। पर सबसे बडा काम सिक्खों ने गुरूद्वारा के माध्यम से बडे पैमाने पर लंगर लगाये आक्सीजन मुहैया कराया वेंटिलेटर तक दवाओं का इंतजाम करवाया  वो काबिले तारीफ़ है। वहीं मंदिर ने भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाई।  संघ ने भी अनेक शहरों में कोरोना के हास्पीटल बनाये। वहीं संघ के कार्यकर्ता  मैदान मे भी मोर्चा संभाला। वहीं मै उधोगपति का उल्लेख न करू तो नाइंसाफ़ी होगी टाटा समूह हर समय की तरह रिलांयस समूह हर की तरह फ्रंट मे मोर्चा संभालते दिखे पर जो बात जापान में दिखी वह यहां दिखतीं तो कोई कारण नहीं था कि हम इस पर विजय प्राप्त कर लेते।  पर हमारे स्वारथ आडे आ गये दुर्भाग्य से यहां राष्ट्रवाद को सांप्रदायिकता के साथ जोड़ दिया गया है।  खैर  यह विषय निश्चित हम लोगों को आइना दिखा रहा है नागरिक कर्तव्यो का कितना महत्व है यह हमे जापान से सीखने की आवश्यकता है पर हमारे यहां तो जान भी  बीपीएल-एपीएल देखकर तय होती है। अब युवा पीढ़ी इससे उबारेगी अंतरराष्ट्रीय पर भारत के शक्ति का अहसास कराएगी बस इतना ही डॉ. रामचंद्र चंद्रकांत वाघ

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