मनोरंजन

बड़े बड़े एक्टर अब तरस रहे दर्शक के लिए, कभी बायकाट की मुहिम होती थी प्रचार का |


आज डा.वाघ की वाल पर हम बालीवुड पर बात करेंगे । बडे बडे हीरो अब दर्शक के लिए तरस रहे है । पूरा बालीवुड घुटने मे आ गया है । लोगो को इस फिल्म इंडस्ट्रीज से ही घृणा जैसे  हो गया है । ये लोग दोहरी जिंदगी जीते है । यहां पर भाई भतीजा वाद चरम पर है । राजनीति के समान कुछ घराने का आधिपत्य भी है । पहले मनोरंजन के साधन सीमित थे तो समय काटने के लिए मनोरंजन के लिए फिल्म देखना ही एकमात्र साधन था । यह भी सच्चाई है पहले की फिल्म मे संदेश हुआ करता था । फिर सशक्त कहानी डायरेक्शन प्रभाव शाली संगीत लोगो को थियेटर मे आने के लिए मजबूर कर देती थी । कभी कोई पिक्चर संगीत के लिए कोई अभिनय के लिए कभी कोई शानदार कथानक के बलबूते ही चल जाती थी । दुर्भाग्य से दो तीन दशको से बालीवुड मे भी कम राजनीति नही हुई यहां भी धर्मनिरपेक्ष सुरमा बैठे जो अपने ऐजेंडे को मनोरंजन के नाम से षड्यंत्र पूर्वक अंजाम दे रहे थे । वो लोग अब एक्सपोज हो गये । किसी भी अच्छे कलाकार का रहस्यमय ढंग से उसका कैरियर खत्म करना इनके लिए बांये हाथ का काम था । कुछ महत्वपूर्ण लोग जो अपने बूते पर अपने ऐजेंडे मे काम करते थे उन्हे तो इस दुनिया से चलता कर दिया । पर सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने पूरी बालीवुड की सच्चाई को ही उजागर कर दिया ।  इस होनहार कलाकार के साथ पूरी बालीवुड का संवेदनहीन होना एक आम भारतीय को कचोट कर रख दिया । वही अपने को स्टार सितारा कहने वाले लोग-बाग का राष्ट्र विरोधी लोगो के साथ संलिप्तता भी एक बहुत बडी नाराजगी का कारण बनी । वही बहुसंख्यक धर्म का मजाक उडाना तो इनका मौलिक अधिकार था । फिर काश्मीर फाइल्स का विरोध जिस स्तर पर किया गया वही उसके लगने और दिखाने के लिए जो बंदिश दिखाई दी लोग इससे आहत तो हुए वही इनके बायकाट का एक तरह से निश्चय तक कर लिया । यह आवाज किसी के कहने से नही स्वफूर्त थी । इसलिए इन स्टार की अपील भी काम नही आई ।  वही अब साउथ की फिल्म के तरफ आश्चर्य जनक रूझान भी बालीवुड के लिए एक खतरे की घंटी है । वही सोशल मीडिया भी प्रभाव पूर्ण भूमिका मे है । लोगो मे जागृति लाने मे इसका महत्व पूर्ण रोल है । लोगो को अब समझ मे आ गया की हम अपने ही पैसो से अपनी संस्कृति को क्षति पहुंचा रहे है । यही कारण है की इस तरह की राजनीति और फिल्म दोनो हाशिए मे आ गये है । जिस बायकाट की मुहिम को फिल्म के प्रचार व प्रमोशन का सशक्त माध्यम माना जाता था आज वही बायकाट फिल्म को औंधेमुंह गिराने की गारंटी सी हो गई है ।
बस इतना ही
डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ





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