TheKashmirFiles विशेष- काश्मीर की स्थिति बिल्कुल वैसे ही हो गई जैसे महाभारत के समय धृतराष्ट्र की सभा मे द्रोपदी की थी – Dr. Wagh – cgtop36.com

डा.वाघ की वाल से आज अपनी बात पर काश्मीर फाइल्स मूवी के तत्कालीन समय की राजनीति पर कुछ वह बाते करना चाहूंगा जिससे आज के लोग अंजान है । उन्नीस जनवरी सन उन्नीस सौ नब्बे चर्चा कहां से शुरू करू यह भी बडा प्रश्न है । मेरे को लगता है काश्मीर की स्थिति बिल्कुल वैसे ही हो गई जैसे महाभारत के समय धृतराष्ट्र की सभा मे द्रोपदी का हुआ था पर तब कम से कम कृष्ण जी बचाने वाले थे । पर अब के समय तारीफ करनी होगी सभी की जिन्होने भीष्मपितामह आचार्य द्रोणाचार्य व महाराज धृतराष्ट्र की भूमिका बखूबी निभाई। आज भी यह फिल्म बनाने का साहस सिर्फ इसलिए हो सका की आज मोदी जी जैसा व्यक्ति बैठा हुआ है । आज के दिन भी यह फिल्म थियेटर के लिए तरसे तो इनके शासन काल मे क्या स्थिति होती पता नही । चलो मैने मान लिया की केंद्र सरकार व राज्य सरकार नकारा थी पर राज्य के लोग तो बडी बडी काश्मीरयत की बात करने वाले थे फिर ऐसे कैसे हो गया ? यही लोग थे जो तीन सौ सत्तर धारा हटाने का विरोध इस लिए कर रहे थे की इससे काश्मीरयत चले जाएगी ? यही इनकी काश्मीरयत थी इसमे भी दोहरापन इनके यहां कोई बाहर का न आए पर ये लोग तब हिंदुस्तानी बन पूरे देश मे जमीन जायदाद खरीद सके चुनाव लडकर राजनीति भी कर सके पर इनके प्रदेश मे कोई झांके भी नही । सेना इनको बाढ से बचाये बाद मे उसे फिर यह लोग पत्थर मार सके । कुछ नही यह सब हमारे राजनीतिक दलो की व नेताओ की मक्कारी के चलते ही यह सब परिस्थितीया निर्मित होती चली गई। चलो विषय पर लौटा जाए निश्चित इसमे पाकिस्तान की भूमिका थी पर यह सब स्थानीय लोगो के सहयोग के बगैर नामुमकिन है इन लोगो ने भी स्लीपर सेल का काम किया है । फिर इसके बाद उन स्थानीय नेतृत्व की जिम्मेदारी है जिन्होने अपने राजनीतिक फायदे के लिए इसमे खाद पानी डालते रहे । पहले कांग्रेस बाद नेशनल कांफ्रेंस व पीडीपी ही इस प्रदेश मे सत्ता के अधिकांश समय काबिज रहे । राम का भजन गाने वाले फारूख अब्दुल्ला तो घटना के समय विदेश मे थे फिर शायद छै साल बाद वापसी हुई । फिर देश के तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की तो सबसे ज्यादा जिम्मेदारी थी । केंद्र मे बैठा वह गृहमंत्री जो अपने ही प्रदेश को न सम्हाल सके उससे अक्षम गृहमंत्री देश मे दूसरा कोई नही हो सकता । अब तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ सिंह जी की बात की जाए अपने राजनीतिक फायदे के लिए यह मंडल के जनक रहे है । स्व.श्रीमती इंदिरा जी ने इन्हे उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री भी बनाया था पर डकैती की समस्या के लिए इन्होने इस पद से इस्तीफा देने की पेशकश की थी । ऐसे समय मे इस धर्मनिरपेक्ष महाशय से और क्या उम्मीद की जा सकती थी । यह उन लोगो मे थे जो रोम जलता रहा नीरो बांसुरी बजाते रहे । फिर भाजपा पर आया जाए यह वह लोग थे जिनके सहयोग से विश्वनाथ प्रताप सिंह अपनी सरकार चला रहे थे पर इन्होने भी उस समय सरकार से समर्थन वापस नही लिया । इन्होने तब समर्थन वापस लिया था जब अडवानी जी का रथ रोका गया था । यह लोग हिंदूओ की राजनीति तो कर रहे थे पर वह अहिंसक व गांधीवाद से ओतप्रोत राजनीति थी । अब आया जाए कांग्रेस वह कांग्रेस जिसके राजनीतिक मुखिया ही काश्मीरी पंडित थे फिर यह विपक्ष मे भी थे मतलब बिल्कुल असहाय भी नही थे । तुम्हारे बिरादरी वालो पर हमला हो रहा हो ऐसे स्थिति मे तो सहायता के लिए तो दौड कर चला जाना था । यह वह लोग है कभी विपक्ष की भूमिका मे स्व.फिरोज गांधी जी ने नेहरू मंत्रिमंडल के एक सदस्य को जवाब देने के लिए फाइल लाने के घर जाने तक को मजबूर कर दिया था । ठीक है सरकार मे नही थे पर सशक्त विपक्ष की भूमिका से किसने रोका था ? वैसे भी मिली जुली सरकार थी ऐसा विरोध करते इनको घुटने मे लाकर खड़ा कर देते । फिर वह स्तर हीन पत्रकार व मीडिया के लोग जो दो पैग मे बिक जाते थे जिन्होने इतना बड़ा सच आने नही दिया । यह लुटियन गैंग बाबरी गुजरात का समाचार बना लेती है पर इस तरह के बहुसंख्यक लोगो के अत्याचार व हत्याकांड पर हर समय की इनकी गहरी खामोशी की कीमत हर समय देश चुकाता है । सबसे अंत मे हम लोग जो तमाशबीन बनकर तब तक रहते है जब तक कोरोना हमारे घर के अंदर न घुस जाए। अगर मोदीजी को इतना समर्थन इसलिए मिल पा रहा है की वह पहले राजनेता है जो सच्चाई के साथ लोगो के सामने आए है हमारे अंदर की राजनीतिक भावनाओ को उन्होने समझा है बस यही काम काश्मीर फाइल्स के विवेक अग्निहोत्री जी ने किया है । यह उस समय का तत्कालीन सच है ।
बस इतना ही
डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ





