विशेष लेख – तहुँ जाबे महुँ जाहूं राजिम के मेला संगी, छत्तीसगढ़ के रंग हे निराला

बचपना मे एक फाग गीत जो होली मे गाये जात रहिस “तोहू जाबे मोहू जाहू राजिम मेला” यह फाग बहुत अच्छा लगत रहिस । कभी सपना मे घलोक नहीं सोचे रहो कि यही राजिम रोड मे रहे बर पडही। कुछ नहीं जेकर दाना पानी जहां लिखायै रहीते तो वहीं रहे बर लागते। अभनपुर मे रहात इकचालीस साल होगे यह पुन्नी मेला के हर रूप ला देखे हो । यही अभनपुर रहाय जहां सायकल दुकान वाला मन घलोक मेला के समय रात भर दुकान खुले राखे। पहली बैला गाडी मे ज्यादा मेला जात रहिस। गाडी के घंटी के आवाज रात भर नहीं बंद होत रहिस। ठंडा ठंडा मे निकले वहीं बीच रास्ता मे साफ सफाई देखकर गाडी ला ढील देत रहिस बैला ला पैरा तहाने कंडा निकाले के बाद अंगाकर रोटी और बैगन के भरता बनात रहिस वो महक आज तक नहीं गे है । समय बदलीस दो दिन के कम से कम के राजिम मेला कहा गवा गे पता नहीं। टूरिस्ट टाकीज सर्कस मौत के कुआं आदि गांव वाला मन ला लुभात रहिस । जो सामान साल भर मे नहीं मिलत रहिस वो यह मेला मे जरूर मिले । अब तो कुछ साल से मेला मोटर साइकिल मे सबेरे जाओ औ संझा वापिस । बस खचाखच भरे रहाय । यह मेला के खासियत रहिस कि पहली दिन माघी पुन्नी के स्नान और शिवरात्रि के बहुत महत्व रहाय । पर आज मै देखत हौ बस खाली औ सडक मे घलोक चहल पहल नहीये हो सकत हे कोरोना के चलते पर जैसे मै गांव वाला मन जानत हो वो मन यह कोरोना फोरोना से नहीं डराय। वहीं मेला मँडई वो मन के जीवन के हिस्सा हे काम मे नहीं जाही पैसा नहीं रहही तो उधारी घलोक कर ले ही पर मेला ला नहीं छोडे । पर यह जरूर है कि पहली कस मेला नहीं लागे । समय घलोक बदल गे हे वहीं मनोरंजन के साधन टीवी और माल मे सब मिलत हे पर मेला के रात रौनक और महानदी के पानी के आवाज ला मिस करतन। चलो ये बदलाव मे पुन्नी मेला के रौनक वैसने रहाय । फिर से एक बार ” तोहू जाबे मोहू जाहू राजिम मेला ” छत्तीसगढ़ी मे लिखे के परयास करे हो कही गलती ला ध्यान न दू हू ।
डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ




