कोरोनाकाल के चलते 5 अगस्त के दिन चाहकर भी अयोध्या नहीं जा पा रहे रामभक्तों के लिए रायपुर में भी कुछ ऐतिहासिक जगह हैं, जहां जाकर अयोध्या जैसी ही अनुभूति प्राप्त की जा सकती है। उन जगहों का दर्शन कर आप भी रामकाज की सेवा में एक तरह से शामिल रहेंगे।
रायपुर के प्राचीनतम मंदिरों में से एक दूधाधारी मठ और मन्दिर का निर्माण हैहयवंशी शासकों ने सन 1553 में कराया था। यह रामानन्दी सम्प्रदाय और शिष्य परम्परा से जुड़ा मन्दिर है। इस परंपरा की देश में दूधाधारी मन्दिर के अलावा राजस्थान में मारवाड़ के झिथड़ा और महाराष्ट्र के भंडारा जिले के पवनी में मठ स्थापित हैं। दूधाधारी मठ के संस्थापक महंत बलभद्र दास का जन्म राजस्थान के जोधपुर के निकट आनन्दपुर कालू गांव में शम्भूदयाल के घर में हुआ था। उनका बचपन का नाम बालमुकुंद था।
बचपन में वे अत्यंत बीमार होकर मरणासन्न हो गए थे। तब उनके पिता शम्भूदयाल उन्हें झिथड़ा मठ के महंत स्वामी कुबाजी महराज के शिष्य स्वामी गरीबदास के पास ले गए। गरीबदास ने उन्हें कहा कि इस बच्चे की जीवन चाहते हो तो उसे भगवान को सौंप दो। शम्भूदयाल ने ऐसा ही किया। मठ में ही रहकर बालमुकुंद स्वस्थ हो गया। इसके बाद स्वामी गरीबदास ने अपने गुरु कुबाजी के निर्देशानुसार उन्हें राम नाम मंत्र की दीक्षा दी और बालमुकुंद का नाम रखा गया बलभद्रदास। अपने गुरु के निर्देश पर बलभद्रदास महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में राम नाम का प्रचार करने लगे।
कुछ समय बाद वे रायपुर आए और टिल्लू चौक के पास राम मंदिर में ठहरे। उस समय राममंदिर की पहचान लक्ष्मीनारायण के रूप में भी थे। मन्दिर के सन्त योगीजी ने उनके ठहरने की व्यवस्था की।मन्दिर में बलभद्र दास के प्रवचनों से भीड़ बढ़ने लगी तो योगी जी की साधना में व्यवधान होने लगा। तब बलभद्रदास के लिए हैहयवंशी राजाओं की मदद से वर्तमान जगह पर उन्होंने मन्दिर बनवाने की व्यवस्था की। बलभद्रदास ने अपने इष्टदेव प्रभु श्रीराम के साथ ही लक्ष्मण की भी बालस्वरूप प्रतिमा स्थापित की। इसी कारण से इसे बालाजी मंदिर भी कहा जाता है।
उनके प्रवचनों में आने वाले लोगों ने उन्हें बताया कि पुरानी बस्ती में एक जगह विशेष पर एक गाय आती है। उस जगह पर बार बार सिर झुकाती है। फिर आप ही आप उसका दूध निकलने लगता है। जिससे वह जगह गीली हो जाती है। उत्सुकता वश वे भी उसे देखने के लिए गए। घटना को देखकर उन्होंने अपने प्रभु श्री राम की आराधना की फि उस जगह की खुदाई करने के लिए कहा। खुदाई में वहां से संकटमोचन हनुमान जी की तीन मूर्तिया निकलीं। एक मूर्ति को वहीं पर स्थापित की गई। खुदाई से वह जगह गहरी हो गई थी। इस वजह से उस जगह को बावली वाले हनुमानजी मन्दिर कहा जाता है। यह जगह पुरानी बस्ती के जैतुसाव मठ और नागरीदास मठ के बीच में स्थित है। दूसरी मूर्ति को गुढ़ियारी के मच्छी तालाब में और तीसरी को दूधाधारी मन्दिर में स्थापित कराया गया।
गाय उन मूर्तियों का अपने दूध से अभिषेक करती थी। इस वजह से उन मूर्तियों का दूध से ही अभिषेक किया जाना लगा। बलभद्रदास जी भी भोजन छोड़कर सिर्फ दूध का ही आहार करने लगे। इसी वजह से उन्हें दूधाधारी महाराज कहा जाने लगा। मूर्ति के अभिषेक और महाराज के लिए दूध की कमी ना हो, उसके लिए मराठा राजा बिम्बाजी भोंसले ने मन्दिर के लिए बहुत सारे गांव जिनमें आज भी सैकड़ों एकड़ जमीन हैं और गायें दान में दी। दूधाधारी महाराज ने एक बार नीम के दातुन से मुखारी करने के बाद उसके दो टुकड़ों जिसे चिरी कहा जाता है को दो जगहों पर फेंका। उन्हीं चेरी से नीम के दो पेड़ पनपे जो आज विशालकाय पेड़ बन चुके हैं। उनमें से एक के पत्ते का स्वाद प्राकृतिक रूप से कड़वा तो दूसरे का स्वाद मीठा है।
दूधाधारी महाराज ने मन्दिर परिसर पर जीवित समाधि भी ली थी। उनके बाद उनके शिष्य सीताराम जी मन्दिर के महंत बने। कुछ समय बाद मन्दिर परिसर में ही एक परिवार ने राम जानकी का भी मन्दिर बनवाया। वर्तमान में इस मंदिर में राजेश्री रामसुंदर दास जी महंत के रूप में पदासीन हैं। इस मंदिर के अधीनस्थ महाराष्ट्र के भंडारा के पवनी स्थित राम जानकी मंदिर, छत्तीसगढ़ में जांजगीर चाँपा का शिवरीनारायण मठ, जगन्नाथ मंदिर राजिम, रायपुर के पुरानी बस्ती स्थित जगन्नाथ मंदिर, राम मंदिर जैतुसाव मठ और गोपीदास मन्दिर भी आते हैं। दूधाधारी मन्दिर का समाजसेवा में बहुत बड़ा योगदान रहा है।
(लेखक शासकीय सेवक अजय वर्मा जी के फेसबुक वाल से साभार)




