छत्तीसगढ़

माता कौशल्या महोत्सव में स्थानीय कलाकारों की उपेक्षा, पंडवानी लोक गायिका प्रभा यादव को भूला संस्कृति विभाग


रायपुर ब्यूरो – अड़तालीस वर्षीय पंडवानी गायिका प्रभा यादव पंडवानी के पितामह कहलाने वाले झाडूराम देवांगन की शिष्या और वर्तमान पंडवानी गायकों की अग्रिम पंक्ति में से एक हैं। पंडवानी प्रस्तुति और प्रक्रिया में परंपरा तथा कलाकार की निजिता का क्या स्वरुप है इस विषय पर उनके विचार जानना रुचिकर है। यह एक अल्प शिक्षित परन्तु अनुभव की धनी पारम्परिक ग्रामीण कलाकार की कलादृष्टि और कला प्रस्तुति की जटिलताओं को समझने का अपना प्रयास है।

प्रभा यादव का कहना है कि सभी पंडवानी गायक, पंडवानी गाते हैं जिसकी मूल कथा एक ही है परन्तु सभी उसकी प्रस्तुति अलग-अलग ढंग से करते हैं। प्रत्येक पंडवानी गायक का अपना अलग ढंग होता है। वे इस कथा के संवाद और उनमें गीतों और भजनों के सम्मिश्रण से भिन्न-भिन्न प्रभाव उत्पन्न करते हैं। रागी भी उस समय की स्थति के अनुरूप हास्य के लिए कुछ संवाद अपनी इच्छा से जोड़ देते हैं।

आपको बता दें कि रायपुर जिले के चंदखुरी में कौशल्या माता धाम में 3 दिनों तक माता कौशल्या महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है एवं चंदखुरी गांव में रहने वाली पंडवानी लोक गायिका प्रभा यादव को ही सरकार भूल गई जबकि इस आयोजन में जिगर राज्यों से भी कलाकार बुलाए गए हैं वही गांव की ही रहने वाली मशहूर पंडवानी गायिका को सरकार भूल गई।

गायक अपनी-अपनी कल्पना से कथा दृश्य की रचना करते हैं जो गायक की निजी कल्पनाशीलता और कथा प्रसंगों एवं कथा पात्रों के प्रति उसके निजी रुझान पर निर्भर रहता है। वे अपने अनुभव के बारे में कहती हैं, जब वे प्रस्तुति करती हैं तब-तब उन्हें कथा और उसके सारे चरित्र अपने सामने घटित होते अनुभूत होने लगते हैं, फिर दृश्य रचना और संवाद स्वतः ही मुख से निकलने लगते हैं। उनका मानना है कि जब तक गायक स्वयं को चरित्र नहीं अनुभव करेगा तब तक उसका अभिनय और संवाद सहज और स्वस्फूर्त नहीं हो सकते।

पंडवानी गायिका प्रभा यादव ने बताया कि 40 वर्षो से अनेक मंचों में प्रस्तुति देने का अवसर मिला है। छत्तीसगढ़ के गांव-गांव, शहर-शहर के अलावा उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत तथा पूर्वोत्तर भारत में भी छत्तीसगढ़ का नाम रोशन कर रही हैं। नई दिल्ली के इंदिरा कला केंद्र में विश्व पंडवानी कार्यक्रम हुआ, जिसमें प्रस्तुति देना अत्यंत गौरवमयी क्षण था। जिसे वह कभी नहीं भूलेंगी।

गुरु प्रसिद्ध पंडवानी गायक झाडूराम देवांगन को मानती है। वे वर्तमान में नागपुर की तीन लड़कियों को पंडवानी सिखा रही है। पंडवानी वीर रस की विधा है, जो जीवंतता प्रदान करती है। श्रृंगार मधुरस घोलने का काम करती है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा गौरव अवार्ड से सम्मानित भी हुई हैं। वे कक्षा तीसरी तक ही पढ़ी-लिखी हैं। माहौल ने इन्हें सब कुछ सिखा दिया है। सुभद्रा हरण प्रसंग इन्हें अत्यंत प्रिय है।

उन्होंने बताया कि विवाह के बाद भी पति का पूरा सहयोग रहा। छत्तीसगढ़ी भाषा पर बताया कि इनमें जो मिठास है वह कहीं नहीं मिलता, यह हमारी दाई की भाखा है। यहां के ज्यादा से ज्यादा छत्तीसगढ़ी बोले तभी संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज होगी और यह दर्जा प्राप्त भाषा बन जाएगी।



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