आलेख – राजनीतिक रूप से भी ब्राम्हण पर निशाना मारना एक फैशन सा हो गया है

आज डा.वाघ की वाल पर हम ब्राम्हण पर ही बात करेंगे । जैसे धर्मनिरपेक्षता मे हिंदूओ पर ही आघात किया जाता है । फिर उसके आगे हिंदूओ मे ब्राम्हण पर आघात किया जाता है । राजनीतिक रूप से भी ब्राम्हण पर निशाना मारना एक फैशन सा हो गया है । पता नही ब्राम्हण को कब तक अपनी अग्नि परीक्षा से गुजरना होगा । किसी ब्राम्हण ने रावण का साथ नही दिया वही हर साल पूरा देश रावण वध कर उसे जलाता है । ऐसा कर हम अनैतिकता पर नैतिकता की जीत मानते है । हम लोग वह है जो वाल्मिकी रामायण पर कथा वाचन करते है । अब वाल्मिकी कौन थे यह बताने की आवश्यकता तो नही है । फिर इतिहास मे ही आया जाए झांसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई क्रांतिवीर तात्या टोपे यहां तक नाना फंडणवीस तक ब्राम्हण थे । वही आजादी की लौ जलाने वाले क्रांतिवीर मंगल पांडे भी ब्राम्हण थे । मै आजाद हू आजाद ही रहूंगा का उद्घोष करने वाले शहीद पं चंदशेखर आजाद भी ब्राम्हण थे । वही दो बार के कालापानी की सजा पाने वाले एकमात्र क्रांतीकारी वीर सावरकर भी ब्राम्हण थे । वही संविधान के निर्माता स्व.भीमराव आंबेडकर को गढने वाले यहां तक अपना नाम तक देने वाले आंबेडकर भी ब्राम्हण थे । वहीं उनसे विवाह करने वाली उनकी पत्नी भी ब्राम्हण थी । वही तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा का उद्घोष करने वाले सुभाष चंद्र बोस जी भी ब्राम्हण थे । बंगाल मे तो एक से एक ब्राम्हण क्रांतिकारीयो का इतिहास रहा है । चलो विषय पर ही आऊ सामान्यतः तो लोग ब्राम्हण बनना चाहते है पर उसके खिलाफ भी बोलने से बाज नही आते । आजकल गायत्री परिवार के माध्यम से लोग प्रशिक्षण लेकर दूसरे समाज के लोग भी ब्राम्हण के कर्म कांड आदि का भी काम कर रहे है जो स्तुत्नीय भी है । वही अपने को ब्राम्हण बताने के लिए अपना गोत्र तथा जनेऊ धारण करते भी दिखा रहे है । यह समाज प्रताडित होने के बाद भी न इसे न्याय मिला है । चाहे आजादी के बाद चितपावन ब्राम्हण और नब्बे के दशक मे काश्मीर पंडितो के उपर हुए अत्याचार विडंबणा यह है की अपने ही देश मे शरणार्थी बनकर रहने को मजबूर हुए है । आज भी सवर्ण वर्ग मे आने के कारण बगैर आरक्षण के बाद भी यह अपनी मेंघा के बलबूते अपनी जगह बनाने मे आज भी क़ामयाब है । यह वह वर्ग है जो हर समय उपेक्षा का शिकार रहता है । शादी ब्याह मे तो नाचने पर आतिशबाज़ी पर दिखावे पर कपडे पर यहां तक मेंहदी पर लाखो रुपये खर्च कर देंगे पर उस गुरुजी जिसमे वह दिन-भर धार्मिक कार्यक्रम करता है उसी निरीह गुरुजी के दक्षिणा पर मोलभाव करते लोग नजर आते है । यह वह लोग है जो अपने सरनेम के चलते ही राजनीति से खारिज हो जाते है । वैसे भी यह समाज चुनाव जैसे खर्च के बोझ को देखते हुए यह वर्ग पहले ही किनारा कर लेता है । इसके बाद भी इस समाज से लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाने मे कामयाब है । कुल मिलाकर यह झुझारू लोग है अपनी जगह तो बनाकर ही रहते है चाहे कही भी रहे ।
बस इतना ही
डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ




