
डा. वाघ की वाल से आज अपनी बात पर हम भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा कुछ लम्हे हमारे जीवन मे कितना आनंद और खुशी लाते है उस पर चर्चा करेंगे । जबकि यही बात कही और नजर नही आती । पिछले कुछ समय से विदेशी धरती पर सनातन धर्म की स्वीकार्यता बहुत ही आश्चर्य जनक रूप से बढ़ी है । पश्चिम के के देशो के कोई भी बडे शहर हो इससे अछूते नही है । लोगो का उन्मुक्त होकर नाचना गाना बजाना उन्हे जहा भक्ति मे लीन कर रहा है वही उन्हे अध्यात्म से भी जोड रहा है । अब स्थिति यह है इसकी खोज मे वो भारत आ रहे है । चलो मूल विषय पर आऊं आज मै इस देश के सभी त्यौहार का जिक्र कर रहा हू । हमारे यहां हिंदूओ का नया साल चैत्र मास के गुडीपाडवा से शुरू होता है । हम महाराष्ट्रीयन इसमे पूजा विधान कर गुडी बांधते है । हमारा मानना है कि नया साल हमारे लिए व देश व सभी के लिए सुख समृद्धि लाए । आज के दिन आंध्र प्रदेश मे इसे उगादी के नाम से मनाया जाता है । वही आज के ही दिन सिंधी लोगो के देवता भगवान झूलेलाल का जन्मदिन है । वही आज से हिंदूओ का विक्रम संवत्सर भी चालू होता है । आज से ही हमारे नये पंचांग व कैलेंडर भी आते है । आज ही के दिन से हम लोगो का नवरात्री की शुरुआत होती है । आज ही मंदिर मे घटस्थापन भी होता है । इसे हम लोग चैत्र नवरात्र भी कहते है । मां की आराध्य के लिए उपवास करते है । इन दिनो मंदिरो मे ज्योत कलश की स्थापना भी होती है । वही कुछ के घरो मे भी ज्योत कलश प्रज्जवलित होते है । लोगो मे इतनी श्रद्धा है कि इस समय लोग नॉनवेज व मध भी छोड देता है । इन नौ दिनो के बाद रामनवमी आती है । भगवान श्री राम का जन्मोत्सव । कितना विशेष है कि जन्मभूमि के लिए लोगो ने अपने प्राणो की आहुति भी दी । आज हम भाग्यशाली है कि हमारी पीढ़ी को राममंदिर देखने का सौभाग्य मिलेगा । फिर चैत्र पूर्णिमा मे हनुमान जन्मोत्सव आता है । इस दिन सभी मंदिर मे पूजा पाठ के बाद लोग उपवास भी रखते है । बहुत जगह तो भंडारा भी लगता है । चैत्र के बाद बैसाख आता है । हिंदूओ का एक और बड़ा त्यौहार अक्षय तृतीया वो अक्षय तृतीया जिसमे गुडी गुड्डा का हमारे परंपरागत विवाह किया जाता है । वही आज से हिंदूओ मे वैवाहिक कार्यक्रम की तिथी की भी शुरुआत होती है । वही पंजाब मे बैसाखी भी जोरदार ढंग से मनाई जाती है । वही इस महीने मे ब्राम्हण के देवता जो आज-कल सभी राजनीतिक दलो के लिए अहम हो गए है परशुराम की भी जयंती रहती है । अब हिंदूओ का अगला मास ज्येष्ठ मास रहता है । इस मास मे गंगा दशहरा रहता है । हिंदूओ मे इसका बहुत महत्व है । आम तौर पर यह प्रचलित है कि सब तीर्थ बार बार गंगा सागर एक बार । लोग गंगा दशहरे के समय ही यह यात्रा करते है । साल मे कुछ समय के लिए ही यह यात्रा का संयोग बनता है । इसी माह मे महिलाओ का एक और विशेष त्यौहार व रीति-रिवाज वट पूर्णिमा भी आती है । मान्यता है कि वट वृक्ष मे पूजा कर चारो तरफ धागो से बांधकर अपने सुहाग की लंबे उम्र की कामना के साथ पूजा कर उपवास भी रखा जाता है । इसके बाद हिंदूओ का अगला महिना आषाढ चालू होता है । इस महिने मे भगवान जगन्नाथ यात्रा की रथयात्रा भी रहती है । दाऊ बलभद्र श्री कृष्ण व सुभद्रा की यह रध यात्रा भारत क्या विदेशो मे भी अब आकर्षण का केंद्र बन रही है । वही इस मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है । इस दिन शिष्य अपने शिक्षक का सम्मान करते है । संघ मे भी गुरू पूर्णिमा मे आयोजित होते रहते है । सावन का महिना त्यौहार करे शोर हो जाता है। यह महिना लोग काफी मानते है । विशेषकर भगवान महादेव का दुग्धाभिषेक हर शिव लिंग मे किया जाता है । लोग अपने अंचल की नदी का पानी लेकर कांवड यात्रा कर जलाभिषेक के लिए नंगे पैर यात्रा करते है । विशेषकर बैजनाथ धाम मे जलाभिषेक के लिए पूरे देश के लोग जाते है । अब तो यह यात्रा देश के हर हिस्सो मे होने लगी है । उल्लेखनीय है कि सावन के महीने मे लोग मांस मदिरा से भी दूर रहते है । इस महिने मे महाराष्ट्रीयन मे नवविवाहित लोग उनका एक मंगलागौर का त्यौहार बहुत जोरो से मनाने की परंपरा है । इसी महिने मे नागपंचमी भी आती है । पहले जैसे इस त्यौहार मे रौनक तो नही रही पर लोग परंपरागत तौर पर मनाते है । इसके बाद लोग कमरछठ की पूजा करते है । विशेषकर महिलाओ का त्यौहार है उपवास आदि रखते है । कमरछठ मे छत्तीसगढ के पसहर चावल का उपयोग किया जाता है । इसके बाद पूर्णिमा मे राखी का त्यौहार आता है । देश मे भाई बहन का यह त्यौहार काफी सद्भाव से मनाया जाता है । पूर्णिमा के सात दिन के बाद कुछ समाज मे विशेषकर गुजराती सिंधी समाज मे साते का त्यौहार मनाया जाता है । सप्तमी मे पडने के कारण इसे साते कहते है । यही एक ऐसा त्यौहार है जिसमे बासा खाना खाने का रिवाज है । फिर अष्टमी मे कृष्ण जन्माष्टमी। पूरे देश मे दही की हांडी फोड़ने की परंपरा है । कृष्ण जी का जन्मोत्सव मे हर हिंदू भक्ति भाव से जुड़ा रहता है । फिर आता है पोला जिसमे हमारे किसान परिवार अपने उन बैलों पूजा करते है जो उनके किसानी का आधार होते है । वही महाराष्ट्रीयन मे एक कहावत प्रचलित है पोला पाउस झाला भोला । मतलब पोला आ गया तो पानी भी कमजोर हो जाता है । वही कुछ लोग सावन अमावस्या भी मनाते है । इसके बाद शुरू होता है भाद्रपद महिना भादो का महिना । इस महीने मे महिलाओ का सबसे बड़ा त्यौहार हरितालिका या तीजा आता है । जिसमे महिलाए व्रत रखती है अपने सुहाग के लंबी उम्र की प्रार्थना करती है । तीजा त्यौहार छत्तीसगढ का विशेष त्यौहार है कम से कम महिलाएं साल मे कम से कम एक बार तो इस दिन जरूर मायका जाती है । हर भाई अपने बहन को लेने उसके ससुराल जरूर जाता है । कितना भी गरीब भाई हो अपनी हैसियत से ज्यादा अपने बहन को देने की कोशिश करता है । पर इस समय का इंतजार हर हर को रहता है । जिससे उसको अपने बचपन की याद ताजा हो जाती है । अपने पुराने परिचितो से मिलने का यह सुनहरा अवसर रहता है । इसी कारण कपडे की दुकानो मे ज्वेलर के यहा काफी भीड रहती है । इसके बाद गणेश चतुर्थी फिर गणेशोत्सव का शुभारंभ सडको मे रौनक सामाजिक कार्यक्रम सांस्कृतिक कार्यक्रम से भरा यह त्यौहार रहता है । लोग घरो मे ही गणेश की स्थापना कर घर के वातावरण को ही बदल देते है । इसी समय महाराष्ट्रीयन मे ज्येष्ठा कनिष्ठा महालक्ष्मी का आयोजन होता है । तीन दिन तक घर मे उत्सव जैसा लगता है । फिर दस दिनो बाद अनंत चतुर्दशी आती है गणेश जी का श्रद्धा पूर्वक विसर्जन । फिर पितृ या पितर जो हमारे पूर्वज को पूजा कर याद करनः का साधन है । हर हिंदू अपने पूर्वजो को तर्पण अर्पण कर साल मे इसी बहाने याद कर लेते है । इन पंद्रह दिन मे तिथी के हिसाब से दान दक्षिणा और पूजा विधान से तर्पण कर हर हिंदू कम से कम अपने पुत्र होने का कर्तव्य निभाता है । एक मान्यता यह है कि इस पक्ष मे कोई भी नई चीज और धार्मिक अनुष्ठान नही किया जाता । जैसे ही पितृ पक्ष खत्म होता है फिर अश्विन का महिना शुरू हो जाता है । यह महिना माता की नवरात्री का महिना रहता है । जहा मंदिर मे घटस्थापना होती है वही घरो मे भी घटस्थापना कर नौ दिन का उपवास और पूरी सावधानी पूर्वक पूजा की जाती है । लोगो अपने आस्था के अनुसार मंदिरो मे ज्योत जलाते है । पूरे नौ दिनो दुर्गा मां के पंडाल मे भीड रहती है । वही गुजराती समाज का देवी मां के सामने उनका सांस्कृतिक पक्ष डांडिया बहुत श्रद्धा से खेला जाता है । अब तो डांडिया के भव्य आयोजन होने लगे है । फिर अष्टमी की विशेष पूजा का महत्व रहता है । लोग कन्या भोजन भी कराते है ।आखिर दशमी को जहा दुर्गा का विसर्जन होता है । वही शाम को हर जगह के दशहरा मैदान मे रावण मारा जाता है । बुराई पर अच्छाई की जीत मानी जाती है । रावण मारने के बाद लोग सोनपत्र लेकर बडो के घर मिलने जाते है । यह एक परंपरागत रिवाज है । फिर पांच दिन बाद शरद पूर्णिमा रहती है । मान्यता है कि पूर्णिमा के चांद के नीचे खीर रखने से अमृत गिरता है जो जिससे हमारे स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद रहता है । वही इस दिन घर के बडे बेटे या बेटी का अक्षवण भी होता है । वही कुछ सामाजिक संस्थाओं ने अस्थमा की दवाई भी मरीजो को खीर मे मिलाकर खिलाई जाती है । किसी समय शरद पूर्णिमा के समय होने वाले भव्य कवि सम्मेलन कविताओ का अमृत बरस जाता था । पर दुर्भाग्य से ऐसे आयोजन मे कमी आ गई है । बस कुछ दिन निकलते नही कि दिपावली का आगाज होने लगता है । सबसे पहले वसु बारस आता है । यह पूजा संतान के मनोकामना और सुखी परिवार के लिए महिलाए यह व्रत रखती है । इसके दूसरे दिन धनतेरस जो एक दिपावली का महत्व पूर्ण त्यौहार है । आज के दिन लोग नये बर्तन गहने ज्वेलरी नये वाहन नये मकान आदि लेने का सबसे शुभ दिन रहता है । कोई मुहूर्त देखने की आवश्यकता नही । यह दिन पूरा अपने आप मे मुहूर्त है । वही व्यापारी लोग आज के दिन अपने नये साल के लिए बही खाते भी खरीदते है । वही आज चिकित्सक अपने संस्थान मे धन्वंतरि भगवान की पूजा अर्चना करते है । वही दूसरे दिन नरक चौदस रहता है । मान्यता है कि इस दिन राक्षस नरकासुर का वध हुआ था । हम महाराष्ट्रीयन मे लोग सूर्योदय के पहले नहाने की परंपरा है इसे शुभ माना जाता है । फिर वह दिन हिंदूओ का सबसे बडा त्यौहार दीपावली लक्ष्मी पूजा । इस दिन हर लोग अपने सामर्थ्य के अनुसार मनाने की कोशिश करते है । अगर कहा जाए तो साल भर का सबसे बड़ा त्यौहार और सबसे खुशी का त्यौहार जितना लिखो कम है संक्षेप मे इतना ही । फिर आता है पाडवा जिसमे लडकिया अपने पिता को वही महिलाओ मे पति का अक्षवण करने की परंपरा है । इसका मतलब यह है कि सुरक्षा । इस दिन हमारे छत्तीसगढ मे गोवर्धन पूजा को बडे उल्लास से मनाया जाता है । वही दीपावली का आगाज तो सुवा नाच से ही होने लगता है । छोटी छोटी बच्चियां घर के बाहर सुवा गाकर यह महसूस कराती है कि यह लोग है जो हमारे संस्कृति के धरोहर के पोषक है । इन बच्चियो को कितना भी दो कोई शिकायत नही रहती । कही कही तो उलाहना भी मिल जाता है कही कोई उनकी अपेक्षा से ज्यादा देता है तो उनकी वो मुस्कान कैद करने लायक रहती है । अब बहुत कम हो गया है नही तो छत्तीसगढ का यह राऊत नाच और उनके बुलंद आवाज मे वो दोहे जो भी उन्ही के बनाये हुए रहते है वही गढवा बाजा की थाप उसमे रौनक ला देती है । यहा सुवा नाच से थोडी भिन्नता है बंदे लोगो ने आपके लिए जो सोचा है उससे कम पर वो कभी राजी नही होते । कभी लेन-देन मे थोड़ा-बहुत उपर कर लेते है पर वह उसके आस-पास ही ज्यादा रहता है । शायद उनके खर्चे उनको यह हठ करने के लिए भी बाध्य करते है । फिर अगले दिन भाई दूज रहता है । जिसमे भाई बहन का त्यौहार है । शायद दिपावली मे ही लोग कम से कम परिचितो से एक बार मिल लेते है । वही यह ही त्यौहार है जिसमे हर काम करने वाला अपने मालिक से इनाम की उम्मीद रखता है । वही यह त्यौहार है जिसमे हर परिवार अपने सामर्थ्य से ज्यादा खर्च कर खुशी महसूस करने की करता है । यह पर्व हफ्ते भर पहले जहां शुरू होता है वही हफ्ते भर बाद तक चलता है । यही कारण है कि बाजार मे बूम रहता है वही त्यौहार के बाद नौकर की समस्या के कारण ढाबा तो बंद ही रहते है । अब सीधा कार्तिक एकादशी तुलसी विवाह आज के बाद शादी-ब्याह का मुहूर्त जो पहले से निकला रहता चालू हो जाता है । हर घर मे तुलसी विवाह होता है लोग व्रत रखते है । इस दिन गन्ना का महत्व बहुत रहता है । फिर कार्तिक पूर्णिमा आती है । यहा अचल के त्यौहार चालू हो जाते है जहां महादेव घाट का पुननी मेला महत्व पूर्ण है । वही छत्तीसगढ के हर गांव मे मंडई की रौनक रहती है । वही सिक्ख का गुरुनानक जयंती भी पूर्णिमा मे ही पडती है । हर जगह लंगर वही उन लोगो की भव्य शोभा यात्रा देखने लायक रहती है । इसके बाद आता है पौष महिना इसमे हिंदूओ का सिर्फ एक ही त्यौहार आता है वह है मकर संक्रांत यहभी त्यौहार देश मे अलग अलग तरह से मनाया जाता । कही इसे पंजाब मे लोहिडी के नाम से मनाते है तो दक्षिण मे इसे ओणम के नाम से मनाया जाता है । तो महाराष्ट्र आदि जगह मे मकर संक्रांत या तिल संक्रांत के नाम से भी जाना जाता है । विशेषकर तिल से बनी हुई चीजो का इस समय महत्व रहता है । तिल के लड्डू तिल की बर्फी रेवडी गजक आदि का भगवान के सामने प्रसाद दिखाकर लिया जाता है । वही महाराष्ट्रीयन महिलाओ मे हल्दी कुंकू भी मनाया जाता है । उल्लेखनीय है इस समय सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण मे आते है । इसके बाद माघ का महिना आता है सबसे पहले बसंत पंचमी का आगाज होता है । इस दिन हिंदूओ मे सरस्वती मां की पूजा की जाती है । एक मौसम मे सुहाना पन रहता है । वही होली मे अग्नि देने के लिए कुछ लकडिया सांकेतिक रूप से रखने की परंपरा सी है । वही इस माह मे राजिम खलारी जैसे जगह मे माघी मेले की शुरुआत भी होती है । छत्तीसगढ का प्रसिद्ध फाग गीत ” तहू जाबो महू जाबो राजिम मेला ” की गूंज होली के समय लोगो को सुनने मिलता है । पर शिवरात्रि मे शिव जी की पूजा का महत्व पूरे देश मे रहता है । हर महादेव मंदिर मे पूजा-पाठ दुग्धाभिषेक होता है । लोग आज बडी श्रद्धा पूर्वक उपवास भी करते है । यह दिन हर हिंदूओ के लिए विशेष महत्व का रहता है । साल शुरू होने से लेकर अंत मे हिंदूओ का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार होली रहता है । एक दिन पहले जहां होलिकोत्सव मे पूजा कर दहन करने की परंपरा है । वही दूसरे दिन रंगोत्सव रहता है । कोई बडा नही कोई छोटा नही इस त्यौहार का महत्व इतना रहता है सप्ताह भर पहले चालू होता है और सप्ताह भर बाद जाकर लोगो की खुमारी उतरती है । निश्चित इस त्यौहार मे हर वर्ग हर मजहब के लोग आनंद उठाते है । गुलाल से लोगो का स्वागत वही कही हास परिहास आयोजित होते है । वही संस्थान मे लोगो को हास्य या व्यंग की उपाधी से भी सुशोभित किया जाता है । इस तरह मैने अपने साल भर के त्यौहार को लिखा है इसके बाद भी हमारी संस्कृति की विरासत इतनी समृद्ध है कि बहुत त्यौहार का जिक्र मै नही कर पाया हू । हम सौभाग्यशाली है कि हमारे इसमे इतने त्यौहार है कि हमारा साल कैसे निकलता पता भी नही चलता है । इसके बाद हमारे राष्ट्रीय त्यौहार जन्मदिन आदि अभी भी बचे हुए है । इसके बाद भी दूसरे धर्म के भी त्यौहार है । हम भारतीय इसी के कारण ही प्रसन्न रहते है । बस इतना ही
डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ




