कोरोना पर मैंने बहुत लिखा है । पर यह बात आपके हृदय को छू लेगी । सत्य है कि कोविड ने बहुत-बहुत से वाकयो और हालातों से परिचय कराया। लोगों में लडने की इच्छा शक्ति को जगाया हौसला बढाया। ऐसी परिस्थिति पर किसी का बस नहीं है। सब उपर वालो पर छोड़ दिया गया है। लोगों ने बहुत ऐहितायति कदम उठाये फिर भी इससे गिरफ्त मे कैसे आ गये इस प्रश्न का भी उत्तर किसी के पास नहीं है। यहां पर मेडिकल साइंस भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। तारीख छै दिसंबर सामान्य सा अवकाश का दिन । एक बैंक मे कार्यरत महिला अधिकारी को उनके बैंक मैनेजर का फोन आता है। कि मै कुछ स्वस्थ महसूस नही कर रहा हू तो दूसरे दिन बैंक मे जाकर सम्भाल लेना । उक्त महिला अधिकारी को भी ठीक नहीं लग रहा था । पर उक्त महिला अधिकारी ने अपने मैनेजर को कोविड की टेस्ट कराने की सलाह दी। दूसरे ही दिन साहब का फोन आया कि मेरी रिपोर्ट पाजिटिव है । तो आनन फानन मे बैंक को बंद कर सेनेटाइज किया गया और लैब से संपर्क कर कोविड की जांच के लिए बंदा बुलवाया गया। पूरे बैंक के स्टाफ की जांच की गई । पर जब तक जांच की रिपोर्ट न आ जाये तो तब तक होम आइसोलेशन जरूरी था । फिर उक्त महिला अधिकारी घर जब आई जब बच्चा दोपहर को सो रहा हो । सबसे बडी चिंता कि सवा दो साल का बच्चा मां के बगैर कैसे रहेगा । इसका हल भी इस बिमारी के सामने कोई मायने नहीं रखता । आपको इसमे होम आइसोलेशन मे रहना है तो परिस्थितियां कैसे भी हो । इसलिए ऐसा लगा कि रिपोर्ट आने तक की बात है। थोड़ी देर तक बच्चे को कैसे भी करके संभाल लिया जाएगा। फिर रिपोर्ट की प्रतीक्षा थी आखिर कार रात को रिपोर्ट आ ही गई है। रिपोर्ट पाजिटिव आई तो कुछ समय के लिए तो शून्य हो गई। पर इस हालात से भी निकलना एक चुनौती तो थी । अब तो हालात से समझौता करना जरूरी था । पर इतना अच्छा था कि दादा दादी फिर दूसरें दिन बच्चे के पिता भी साथ थे । जैसा लग रहा था कि बच्चा परेशान करेगा पर भगवान का शुक्र है कि उसने बिलकुल ही परेशान नहीं किया उसे लग रहा था कि जैसे उसे बताया गया कि मां आफिस बैंक गई हुई है। बिल्कुल सामान्य सा रहने लगा । उसको बच्चे के खेलने की आवाज मस्ती की आवाज उसे दरवाजे के दूसरे तरफ आकर्षित करतीं थी । पर मन मसोसकर एकांत मे रहने के लिए विवश होना पड़ता है । उसका दूध पीने के समय का रोना ब्रश को अपने हाथ से करने की जिद के लिए रोना विचलित कर देता था। पर इश्वर का धन्यवाद कि आज हम मोबाइल से वीडियो काल कर हम उस दूरियों को कुछ समय के लिए कम कर लेते हैं। इस दरम्यान दिन भर की बात और मोबाइल से ही बहुत ज्यादा प्यार हो जाता है। मोबाइल को ही आलिंगन कर बच्चे को तो यह महसूस होता है कि वो अपने मां से ही आलिंगन कर रहा है। बच्चे की हर गतिविधि को मोबाइल मे कैद कर शेयर हो जाती है। उसके उन लम्हो को देखने से ही आत्म संतुष्टि का अनुभव होता है। फिर मोबाइल मे बात बच्चा तो कम करता है उसे कट कर फिर लगाने मे ही आनंद आता है । इस दरम्यान मेरे वो शौक जो मैरी व्यस्तता के चलते छूट गए थे। उससे मै फिर मुखातिब हुई हो । पहले नावेल पढना दूसरे मे पेंटिंग शामिल है। इस दौरान मैंने करीब आठ पेंटिंग बनाई जो मेरे निकट के लोगों को काफी पसंद आई । इस रचनात्मक काम मे क्रिएशन भी हो रहा है और समय कब खत्म हो रहा है पता भी नहीं चल रहा है। वहीं मैंने अपने शौक किताब पढने का चालू किया उसमे मैंने बच्चो से संबंधित किताब पढी जिसमे whole brain chiled , Strong mother Strong sons , Whow to talk so that littile kids will lessen पढी ।शुरू में तो ऐसा महसूस हो रहा था कि यह समय कैसे निकलेगा। मेरे श्वसुर जो कोविड पीड़ित थे उनसे भी कहा कि बाबा आपको तारीफ की आपने यह दिन कैसे बिताया । उनके फार्मूले ने मुझमे एक अंदर ताकत भी आई । इस बीच मेरे सांस मां ने कहा कि इनहोने लोगों को फोन कर जहां दूसरो को परेशान किया वहीं अपने समय को निकाला। कुछ दिनों के बाद ही उक्त महिला अधिकारी ने अपने चिकित्सक से पूछा कि सर मै अपने बच्चे से मिल सकती हू । चिकित्सक ने कहा कि आपके और बच्चे दोनों के लिए अच्छा है कि आप बिलकुल अलग रहे । वैसे भी वर्किंग वुमेन के बच्चे को भगवान अपने आप उन्हे एडजस्टमेंट करनें की शक्ति देता है । चिकित्सक की बात बिलकुल सही है अभी तक किसी को उसने मां के पास जाना है कभी नहीं कहा । मेरे घर वालों की भी तारीफ करनी होगी कि उनहोंने बच्चे को यह तक भनक नहीं होने दी की मां घर पर है । मेरे को खाना चाय आदि देने के समय उसे किसी भी बात के बहाने दूर ले या जाता था । फिर वह दिन आ ही गया जब मेरा होम आइसोलेशन का समय खत्म हो गया। मैंने अपने निकलने का समय दोपहर का चुना जब वो सोता है। जब उसके उठने के पहले मैने आवाज दी तो शायद उसे भ्रम लगा होगा । फिर जब उसने नींद में अपनी एक बारगी की आंखें खोली तो विस्मय की स्थिति में था । थोड़ी देर कर आया फिर उसके प्यार की हरकतें मेरे से बिलकुल थोड़ी देर के लिए लिपट जाना मेरे लिए एक सुखद सी और न भूलने वाली स्मृति पटल मे अंकित क्षण था । यह सिलसिला करीब करीब रात होते तक चला जब तक वो सो नहीं गया। अब फिर वहीं दिनचर्या पर यह अनुभव भी जिंदगी कभी दुखद तो थोड़ा सुखद भी कहा जा सकता है। शायद इस बिमारी ने मुझे अपने विल पावर से परिचित कराया वहीं अपने सोये हुए शौक को भी जगाया। मै सोचती हू कि अब इस बिमारी के चलते अब मै पहले से जहां ज्यादा स्ट्रांग हो गई हू । इस कोविड ने जितना मुझसे लिया उससे ज्यादा लौटाया है । परिवार कितना अहम होता है इसी समय पता चलता है । उल्लेखनीय है कि उक्त महिला अधिकारी कोई नहीं मेरी बहू विपुला सौरभ वाघ मेरा पोता अक्षज वाघ दादी मनीषा वाघ और दादा जी मै चंद्रकांत वाघ । जैसा विपुला ने मेरे को बताया । बस इतना ही
डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ





