
पिछले दिनों भारत रत्न सुश्री लता मंगेशकर जी और मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर जी के टवीट पर एक राजनीतिक तूफान सा खडा कर दिया है। अब इसकी जांच भी होने वाली है । उल्लेखनीय है कि भारत का जनमानस सुश्री लता दीदी को सरस्वती मानता है तो वहीं सचिन जी को क्रिकेट का भगवान मानता है । पर देश के पक्ष मे दिये टवीट ने क्यो किसी की भावनाएं आहत हुई यह समझ से परे है । जब कुछ विदेशी सेलिब्रेटी देश के खिलाफ अनरगल बोले तो देश के सेलिब्रिटीयो का भी फर्ज बनता है कि वो इसके खिलाफ सामने आए । वहीं इन दोनों हस्तियो ने किया। इसमे न किसी दल के खिलाफ कोई बात है न देश के खिलाफ। फिर जिस तरह से सचिन जी के पोस्टर पर कालिख पोती जा रही है वह दुखद है । यही लोग है जो अभिव्यक्ति की आजादी के पुरोधा है। चाहे फिर उमर खालिद हो चाहे कन्हैया कुमार हो या फिर टुकड़े टुकड़े गैंग के लीडरान हो इनकी अभिव्यक्ति के लिए यह लोग आकाश पाताल कर देते है। दुर्भाग्य से दूसरे लोगों की अभिव्यक्ति सिर्फ इनके हिसाब से ही तय होनी चाहिए। बाकी लोगों को तो बोलने का हक नहीं है । उनकी अभिव्यक्ति से अगर इन्हे राजनीतिक हानि दिखती है तो ये आजादी के पुरोधा सब बाहर निकल आते है । कुछ लोग यह कहते लिखते भी दिख रहे है कि यह हमारे कार्यकाल में दिया गया है। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि वो आपके लिए जिंदगी भर का बंधक तो नहीं बन गया ? फिर दिया तो यह वयक्ति गत तौर पर तो नहीं दिया गया है। यह राष्ट्र का सम्मान है । जो पूरी तरह से सभी मापदंडों को पूरा करने पर ही मिलता है। पहली बात तो यह है कि यह कोई खैरात नहीं है। भारत रत्न देने के पहले दस बार सोचा जाता है फिर इन दोनों हस्तियो का देश के लिए अपना बहुमूल्य योगदान है । जब देश किसी हस्ती को नवाजे तो उस हस्ती की जिम्मेदारी देश के लिए और बढ जाती है। कोई विदेशी कुछ कह कर चले जाए तो अपनी देश की अखंडता व संप्रभुता के लिए देश का कोई भी रत्न कैसे खामोश रह सकता है । नहीं तो कुछ ऐसे लोग भी अलंकरण से नवाजे गए है जो विवादास्पद रहे है । या तो होटल मे किसी के साथ मार पीट का मामला हो या काले हिरण के शिकार का । तब कोई बंदा यह नहीं बोलता कि इन्हे हमारे समय मे दिया गया है । वहीं पद्म के अपमान पर भी कोई धरना या आलोचना नहीं दिखाई देती है । यह दोहरा मापदंड कहां से आ जाता है । आज नब्बे साल की उम्र मे लता जी को क्या चाहिए । ऐसे मे वहां से वो आती है जहां शिवाजी महाराज के राष्ट्रवाद का उदघोष होता रहा हो । जिसने देश भक्ति के हजारों गानों से देश के लिए कुछ कर गुजरने की लोगों मे इच्छा पैदा कर दी हो फिर ऐसे हालात में उनके जज्बे कैसे खामोश रह सकते है । दूसरी तरफ़ क्रिकेट का वो सितारा जिसे देवताओं की तरह पूजा गया हो । जिसने क्रिकेट के माध्यम से दूसरे देशों को हराया हो । फिर ऐसे समय मे विदेश वाले आए और कुछ अप्रिय बोलकर चले जाए तो कोई क्रिकेटर बेटिंग क्यो न करे ? कुल मिलाकर जिसमे हाथो हाथ लिया जाना चाहिए वहां इस तरह के हालात से आम भारतीय भी अचंभित है । मै अपने पाठकों के विवेक पर यह बात छोडता हू कि वे रिहाना ग्रेटाथनबर्ग मियां खलीफा के साथ है या भारत रत्न लता मंगेशकर व भारत रत्न सचिन तेंदुलकर के साथ । बस इतना ही
डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ




