एक ऐसे कलाकार जो रंगमंच को जिया करते थे, 110℃ के बुखार में भी जिसकी कलम ही उसे आराम देती थी। बारह बारह घंटे की रिहर्सल में ऐसे डूबे रहते ना दिन की खबर होती ना रात की। उनकी पूरी टीम उनके साथ रिहर्सल करती, जब रात 12 बज जाते तो सब कहते “हमन भात कब रंधबो” तो वह कहते “अरे रुको अभी तो आएगा असली रंग”। आज उनकी पुण्यतिथि पर सीएम बघेल ने उन्हें यद् कहा कि –
आपको बता दें कि हबीब तनवीर का जन्म 1 सितंबर 1923 को रायपुर में हुआ। स्कूली शिक्षा रायपुर से और बीए नागपुर के मौरिस कॉलेज से करने के बाद एक साल एम ए का अध्ययन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से। कोशोरावस्था में ही हबीब कविताओं को अपना हिस्सा बना चुके थे और थिएटर में उनकी रुचि बढ़ने लगी थी। युवा हबीब कविताये लिखना प्रारंभ कर चुके थे, उसी दौरान उन्होंने अपना उपनाम तनवीर अपने साथ जोड़ा था। उनका पूरा नाम “हबीब अहमद खान” था।
वे शनैः शनैः थिएटर के साथ गहरा रिश्ता बना रहे थे और इसका कारण शायद जर्मन थिएटर आर्टिस्ट “बरटोलट ब्रेच” थे। हबीब “बरटोलट ब्रेच” की थिएटर कला से काफी प्रभावित थे, हबीब अपनी यूरोप यात्रा के दौरान ब्रेच से मिलने बर्लिन भी गए थे पर अफ़सोस उनके पहुचने के कुछ समय पहले ही बरटोलट ब्रेच का निधन हो गया था। हबीब ने फिर वहाँ रह कर ब्रेच की थिएटर कंपनी में काम किया और वहाँ के थिएटर को करीब से समझा।
हबीब की यूरोप यात्रा थिएटर में नए पहलुओं की खोज के लिये थी। वह 1955 में जब इंग्लैंड गए वहाँ उन्होंने रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट (राडा) से अदाकारी व थिएटर के तकनीकी ज्ञान की शिक्षा ली। थिएटर और साहित्य की ज़िंदगी मे एक नया किस्सा यूरोप में उनके साथ जुड़ गया, उनकी मुलाकात हुई जिल मैकडोनाल्ड से। जिल का ज़िक्र हबीब ने अपनी सस्मरण में लिखा है। कविता, राजनैतिक, और स्नेही झुकाव, अलग अलग स्त्रियों के साथ अपने प्यार की यादे और एक महिला मोनिका मिश्रा जो अततः उनकी पत्नी हुई। अन्य महिलाओं के उल्लेख में सबसे महत्वपूर्ण “जिल मैकडोनाल्ड” थी।
जब हबीब 1958 में भारत वापस आ गए, उन्होंने दिल्ली में “बेगम कूदिया गैदी” का हिंदुस्तानी थिएटर जॉइन कर लिया। और यहाँ वह मोनिका मिश्रा से मिले जो हबीब की पत्नी हुई। जब वह मोनिका मिश्रा से मिले तब वह अपने नाटक मिट्टी की गाड़ी के निर्देशन में लगे हुए थे। यह संस्कृत में लिखे एक नाट्य साहित्य का छत्तीसगढ़ी रूपांतरण था, जो उनका पहला महत्वपूर्ण छत्तीसगढ़ी नाटक बना। उन्होंने कई वर्षों तक देश भर ग्रामीण अंचलों में घूम-घूमकर लोक संस्कृति व लोक नाट्य शैलियों का गहन अध्ययन किया और लोक गीतों का संकलन भी किया।
हबीब ने छत्तीसगढ़िया लोक कला को रंगमंच से जोड़ा और उनका यह प्रयोग सफल भी रहा। चरण दास चोर हबीब का सबसे लोकप्रिय नाटक था। ये ड्रामा तीन दशकों तक भारत और यूरोप में स्टेज किया गया। “इनका नाटक ‘चरणदास चोर’ एडिनवर्ग इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टीवल (1982) में पुरस्कृत होने वाला ये पहला भारतीय नाटक था।”
ये ड्रामा लोगो को इसलिए भी यादगार हुवा कि इसमें नया थिएटर के कलाकारों ने अपनी स्थानीय भाषा यानी छत्तीसगढ़ी में संवाद अदा किए थे। छत्तीसगढ़ के छह लोक कलाकारों के साथ उन्होंने 1959 में भोपाल में नया थिएटर की नींव डाली। उन्होंने नाटक चरणदास चोर पर एक हिन्दी फिल्म का निर्माण भी करवाया जिसके फिल्मकार श्याम बेनेगल थे और उसमें स्मिता पाटिल ने मुख्य भूमिका निभाई।
छत्तीसगढ़ की नाचा शैली में 1972 में किया गया उनका नाटक ‘गाँव का नाम ससुराल मोर नाम दामाद’ ने भी खूब वाहवाही लूटी। तनवीर को 1969 में और फिर 1996 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। 1983 में पद्श्रमी और 2002 में पद्मभूषण मिला। 1972 से लेकर 1978 तक वे उच्च सदन ‘राज्यसभा’ के सदस्य भी रहे।
गौरतलब है कि पत्रकार के तौर पर अपने कॅरियर की शुरुआत करने वाले हबीब ने रंगकर्म तथा साहित्य की अपनी यात्रा के दौरान कुछ फिल्मों की पटकथाएं भी लिखीं तथा उनमें काम भी किया। रिचर्ड एटनबरो की मशहूर फिल्म ‘गांधी’ (1982) में भी उन्होंने एक छोटी सी भूमिका भी निभाई थी।



