आलेख – माननीयो के काफिले और आम आदमी की परेशानी
मैने किसी समाचार मे पढा था शायद स्विट्जरलैंड के राष्ट्र प्रमुख सार्वजनिक गाडियो का इस्तेमाल करते है । हमारे देश में ही त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री शायद मै गलत न हू तो नृपेन चक्रवर्ती जी भी ने कोई सुविधा नहीं ली । मै अपने मूल विषय पर आऊं तो हमारे जनप्रतिनिधि फिर मंत्री भी हमारे बीच से ही आए लोग रहते है । फिर सत्तासीन होने के बाद व्यवहार मे अचानक परिवर्तन आ जाता है। थोड़ा सत्ता का वह सुख जो आम लोगों को इनसे दूर करता है फिर यह उसी स्वाद मे मदमस्त हो जाते हैं। फिर यह भी भूल जाते है कि यह हमारे बीच के लोगों मे से एक है या फिर आने वाले कुछ सालो बाद ही फिर इसका हिस्सा बनने वाले है । तकलीफ आम आदमी को तब होती है जब यह महामहिम लोगों का कारवां गुजरता रहता है तो उसके पंद्रह मिनट पहले ही चौक को या आम रास्ते को बेदर्दी से बंद कर दिया जाता है। उस दरम्यान पुलिस भी अपने डयूटी के चलते सख्त हो जाया करती है जिससे वह आम लोगों से अपेक्षित व्यवहार नहीं कर पाती । आज के भागदौड़ में यह कीमती समय जाया होना काफी मानसिक तनाव पैदा करता है । हो सकता है कि इसमें कोई एंबुलेंस हो जिसका हर पल जिन्दगी मौत की लडाई लड रहा है इन माननीयो के लिए उसे रोक कर रखना चिकित्सा के साथ मानवता के साथ भी खिलवाड़ है । कई बार अखबार की सुर्खियों मे आया है कि इन लोगों के कारण सामने वाला अपनी जिंदगी की लडाई हार गया है । क्या होता है पता चलने के बाद बस अपने श्रद्धांजलि के पिटारे मे से एक श्रद्धांजलि निकाल कर पोस्ट नहीं कहूंगा फेंक दी जाती है। अगर कोई संवेदनशील होता तो कहता कि मै यह सुविधा छोड़ रहा हू मेरे चलते एक बंदे की जान चली गई। आज तक पढने मे नहीं आया । पंद्रह मिनट के इस भीड़ में कभी वो भी बंदा फंस जाते हैं जिनकी या तो परीक्षा रहती है या नौकरी का इंटरव्यू या फिर कोई कोर्ट का काम। या तो उससे हाथ धोना पडता है वही न्यायालय मे अगली तारीख या फिर समय पर न पहुंचने के लिए नसीहत । मुझे ज्यादा तकलीफ तब लगतीं हैं कि माननीयो के गाडी के आगे की पायलट गाडिया डंडा लहराते हुए तेज रफ्तार से निकलती हैं तो अनजाने मे कभी चलती गाडी में गाडी को लगने का डर या दुपहिया वालो को भी लगने का डर बना रहता है । फिर जब यह सुनने में आता है कि उक्त माननीय पहले जमानत मे है । या फिर बाद मे किसी जेल मे ही बने रहने के लिए गुहार लगा रहा है । या फिर एक जमानत बडी मुश्किल से मिलने के बाद दूसरी जमानत के लिए जेल से अपनी रिहाई का इंतजार कर रहा हैं। फिर ऐसे लगता है कि ऐसे माननीयो के लिए रास्ते बंद हो जाते है। जब यह सरकार चाहती है कि देश का हर नागरिक कानून कायदे पर चले तो सबसे पहले तो यह मिसाल इन लोगों को ही रखनी चाहिए। अब कोरोना मे देश ने भी देख लिया है कि जब काम आनलाइन बैठकर घर से ही किया जा सकता है तो इस संसकृति को तो प्रशासन मे भी लाया जा सकता है। वैसे भी संसद की कार्यवाही विधानसभा की कार्यवाही मे इनके योगदान और उपस्थिति का पता देश को समाचारों से पता चलते रहता है । बस यह तामझाम भव्यता ज्यादातर उदघाटन और मीटिंग के लिए ही रहती है। इसके बाद भी यह समय पर नहीं पहुंच पाते । आज देश के हर शहरों का ट्रेफ़िक काफी वयस्त है इतने समय मे जाम जैसी स्थिति बन जाती है। इसका अहसास इन्हे सत्ता से हटने आम नागरिकों जैसे होने के बाद ही महसूस होता है । शायद इस कल्चर से निजात पाना नामुमकिन ही नहीं मुश्किल है । क्योकि यही इन्हे आम लोगों से विशेष का अहसास कराती है । बस इतना ही
डा .चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ




