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विशेष लेख – कोरोना से परिवहन व्यवसाय पड़ा ठप्प, ठूंस ठूंस कर चलती थी गाड़ियां – डॉ. चंद्रकांत रामचंद्र वाघ

कहते है कभी ऊंट पहाड के नीचे और कभी पहाड़ ऊंट के नीचे । कोरोना ने जो अपना प्रभाव दिखाया है उसमें सबसे ज्यादा प्रभावित यातायात के साधन रहे है । इसमें राज्य स्तरीय व लोकल बसों पर जरूरत से ज्यादा नुकसान हुआ है । एक समय ऐसा था कि इन बस वालो को यात्रियों के तकलीफ से दूर दूर तक कोई लेना देना नही रहता था । पूरी बस भरने के बाद स्टैंडिंग भी पूरी तरह से भर लिया जाता था । हालात यह रहते थे कि यात्री मात्र बूत बन कर यात्रा करने को बाध्य होता था । कहीं से भी आप सरक नहीं सकते थे । वहीं सवारी लेने के नाम से बस थोड़ा आगे ही सीट मिल जाएगी यह हर बस वालों का जुमला रहता था । पर आखिर तक बैठने को नहीं मिलता था । वहीं शुरू में पास वाले सवारी को भी बैठा लिया जाता है पर दूर की सवारी मिलने पर बैठे हुए सवारी को उठा दिया जाता है । कितना अपमान लगता होगा सामने वाले को इस पर कभी विचार ही नही किया होगा । वहीं रात बेरात लंबी दूरी की बसे भी यात्रियों के मजबूरी का पूरा फायदा उठाते है । पहले तो ले जाने से ही मना करेंगे जिससे यात्री उनसे अनुनय-विनय करेंगा फिर साहब अपने नेकसट स्टाप का किराया मांगेगा जो उसके किराये से दो गुना तो रहेगा ही मांगने पर मजबूरी में तैयार होना पड़ता है । वहीं कभी कभी बसों को चालक इतना तेज दौडाते है कि यात्रियों की सांस थमी नजर आने लगती है । चलो यह बसों का एक पहलू है जिसे आज जब पहिये रुके हुए हैं तो कम से कम गौर कर लेना चाहिए । कोरोना के कारण अगर कोई व्यवसाय सबसे बुरी तरह से चपेटे मे आया है तो यह बस व्यवसाय है । पच्चीस मार्च के लाॅकडाउन के बाद आज तक इनसे जुड़े लोग कैसे अपना जीवन यापन कर रहे हैं यह भगवान ही जानता है । और आज भी दूर दूर तक इस पर कभी विचार ही नही किया जा रहा है । एक बस से कम से कम पांच लोगों का जीवन निर्वाह होता है । यह पांच लोग बेरोजागर हो गये । वहीं स्टैंड मे आवाज देकर बैठाने वाले टाइम होने पर बस को सीटी देकर रवाना करने वाले वही वो जो बस बैठे ग्राहकों को खाने आदि का सामन बेचने वाले होटल आदि व्यवसाय में व काम करने वालो को काफी नुकसान हुआ है । बात यहा तक भी होती तो भी कोई बात नहीं । बस के मालिकों पर दोहरी मार झेल रहे है । एक तो लोन वो भी प्रायवहेट कंपनियों का वो उनके लिए परेशानी का सबक बन गया है । कुछ लोगों का कहना है कि हमारे हाथ खडा करने पर भी कंपनियां भी पेशोपेश मे है । जो कंपनी कल तक दादागिरी करती थी आज किश्त न मिलने पर भी हाथ जोड़कर खडी है । आज उनकी हालात यह है कि गाडी ले जाने के बाद उनसे गाडी कौन लेगा । वहीं मालिक की तकलीफ यही आकर खत्म नहीं हो जाती । बस भी खडे खडे कबाड़ में तब्दील हो रहा है उसकी चिंता है । जहां गाडी खडे खडे चक्को की हवा निकल जाती है । वहीं मशीन भी जाम हो जातीं है । गाडी चलने से ही यह सब ठीक रहते है पर खडी गाडी मे मशीन रवां नहीं हो पातीं । एक बस मालिक का कहना यह है कि इंजन खडे होंने के कारण से फेल न हो जाए । अभी तो इसकी भी बहुत बडी चिंता है । जैसे सुनने में आया है कि शासन की जो शर्त रखी है कि चलाने की अनुमति देने के लिए वो काफी नुकसान दायक है । यही कारण कि बीच मे कुछ बसे चालू भी हुई पर अंततः उन्हे भी बंद करना पड़ा । शासन के अनुसार एक सीट छोड़कर सवारी मतलब आधे बस भरने की बात है । वहीं किराया बढाने की भी अनुमति नहीं है । ऐसे मे बस का भी खर्च निकलना मुश्किल है । अगर किराया बढाया जाता है एक सवारी से दो सीटों का किराया लिया जाता है तो इतना महंगे किराये मे कौन जाएंगा । वहीं जागरूक लोग पहले ही यात्रा से अपने को अलग कर रहे है । यही कारण है कि इसका समाधान निकल ही नहीं पा रहा है । वहीं बस वालो की चिंता यह भी है कि इतने दिनों से बस बंद है पर किसी भी हलकों से बस चालू करने की मांग तक नहीं उठ रही है यह ज्यादा चिंता का विषय है । वहीं दूसरी ओर लोग भी यातायात के मामले मे आत्म निर्भर होना ज्यादा चाह रहे हैं । इसीलिए दो पहिये और कार की बिक्री बहुत हुई है । जिसका साफ असर कोविड खत्म होने के बाद भी इस व्यवसाय मे दिखने लगेगा । यह चिंता भी इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को है । पर यह तय है कोविड मे सबसे ज्यादा प्रभावित लोग अब इससे कैसे बाहर निकलते है यह आने वाला समय बताएगा । पर बस स्टैंड मे वो आवाज़ राजिम राजिम धमतरी धमतरी रायपुर रायपुर सुनने को नहीं मिल रहा है । बस स्टैंड विरान है । बस इतना ही
डा .चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ

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