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विशेष लेख – भारत को लेकर चीन के साथ पाकिस्तान भी निश्चिंत था कि इस पौरुष जागृत नहीं हो सकता पर हुवा उलट

कल संसद के सदन मे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चीन के साथ चल रहे नौ महीने के सीमा पर जो भी गतिविधिया चल रही थी उस पर अपना वक्तवय  दिया।  पिछले नौ महीने दोनों देश युद्ध के मुहाने मे खडे थे । इसके कारण दोनों देशों के सामान्य संबंधों पर भी फर्क पडा। इसके कारण चीन के सामानों का बहिष्कार उनके एप  का बहिष्कार से चीन को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड रहा था।  कोरोना के समय ऐसे स्थिति मे दोनो देशो को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था । दुर्भाग्य से चीन ने भारत को आकने मे बहुत बडी गलती कर दी । सन बैंसठ का भारत ही याद रहा वहीं वो शासक भी उसके  जेहन में रहे जो उनके आगे जिनकी घिगगी बंध जाती थी ।  यही कारण है कि चीन अभी तक बेखौफ़ था । पर अब देश में राष्ट्रवादी सरकार आ गई तो नीतियो मे भी परिवर्तन हुआ।  मोदी जी ने रक्षा पर बहुत ध्यान दिया।  उन्होंने दोनों पडौसी देशों को जेहन मे रखकर ही रक्षा पर खर्च किया।  आजादी के बाद रक्षा मे इतना खर्च कभी भी नहीं हुआ था।  वहीं इस समय चीन को वो आवाज नहीं सुनाई दी जो सत्ता के गलियारों से निकलती थी कि वो कुछ भी कर ले ” नो फायरिंग  ” । यही कारण था कि चीन के साथ पाकिस्तान भी निश्चिंत था कि कुछ भी कर लो इस देश का पौरूष कभी भी जागृत नहीं होता है।  यही कारण है कि उसने शहीद हेमराज का सिर वापस भेजने का दुःसाहस किया शहीद सौरभ कालिया के शव को क्षत विक्षत कर भेजा । वहीं मुंबई के छब्बीस ग्यारह मे हमारे सत्तासीन नेताओं ने जमकर विरोध कर आतंकवाद से लड़ने का दृढ संकल्प दिखा दिया।  पर मोदी है तो मुमकिन है ने अभिनंदन कैसे लौटा देश ने देखा है।  पुलवामा पर कैसे कार्यवाही हुई देश ने देखा है।  फिर से विषय पर चीन ने डोकलाम पर मोदी जी का लिटमस टेस्ट कर लिया उसके बाद भी अक्ल नहीं आई थी । फिर से उसने दुःसाहस किया पर इस समय की सरकार ने सेना के हाथ खुले छोड दिया।  शायद यह पहली बार हुआ हो । जिससे सेना के हौसले बुलंद थे जिसका परिणाम यह हुआ कि चीन की सेना अंदर से डरी हुई थी । वहीं इस सख्ती के साथ आर्थिक सख्ती ने भी चीन को अधमरा कर दिया था । बात यहां तक होती तो कोई बात नहीं चीन को विदेश नीति से ऐसा घेरा गया कि वो अलग थलग पड़ गया था।  उसके दोस्तों मे पाकिस्तान और हमारे यहां के कुछ नेता और दल ही खडे दिखते थे।  उन्होंने अपना फर्ज भी निभाया और सरकार को घेरने मे और देश मे भय का माहौल बनाने मे अपने तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी  । पर देश आशवसत था कि कुछ नहीं होने वाला है।  विदेश नीति का ही परिणाम था कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त इसके चलते चीन के विस्तार वादी नीतियों के खिलाफ हर छोटे पडौसी देश भारत के विश्वस्त साथी बन गए । हालात तो यह हो गए कि ताईवान जैसे देश ने भी चीन को उसकी औकात दिखा दी । इंडोनेशिया जैसे देश उसके खिलाफ खुलकर सामने आ गये । वहीं बादशाहत के झगड़े ने भी अमेरिका को चीन के खिलाफ दक्षिण एशिया मे विश्वस्त सहयोगी की तलाश में आखिर भारत को ही चुनना पडा । यही कारण है कि हम आज अमेरिका जापान आस्ट्रेलिया के साथ कवाड का हिस्सा बन गए है।  वहीं हमारे तीनो देशों के सेनाओं के साथ समुद्र में सैन्य अभ्यास भी चल रहे है । यह घटनाओं ने चीन की नींद उड़ा दी है।  फिर हांगकांग पर चल रहे लोकतन्त्र का आंदोलन भी उसके गले की हड्डी बना हुआ है।  वहीं पडौसी देश जापान से काफी तल्खी है । फिर ग्लेशियर मे चोटी के उपर जिस तरह से भारतीय सेनाओं को महारथ हासिल है उसका नितांत अभाव चीन के सैनिकों मे है । वह दृश्य जहां चीन की सेना अपने बार्डर पर रोती हुई आने को मजबूर है यह भी विश्व ने देखा है।  वहीं वैक्सीन के मामले मे भी चीन वैक्सीन को जो कामयाबी हासिल होनी थी वह उसे हासिल नहीं हो पाई । भारतीय वैक्सीन की मांग और कोविड के काल मे दवाई की मांग ने भारत की चिकित्सा के अनुसंधान मे काम को डब्लयू एच ओ से लेकर सभी ने सराहा।  जहां चीन कोरोना दाता बना वहीं भारत इससे निजात दिलाने वाला देश बना । इतना होने के बाद भी चीन बिलकुल भरोसे के काबिल नहीं हैं।  कब वो पीठ पर खंजर भोंग दे कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। निश्चित यह बात सरकार भी जानती होगी।  पर हमें सतर्क रहने की आवश्यकता है।  यह बात तय हैं कि अब कम से कम मोदी जी के और राष्ट्रवादीयो की सरकार रहते तक वह दुःसाहस नहीं करेगा।  वहीं उसके वापस लौटने पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उसके दावे की पोल खुल गई जिस पर वो अपना हक दिखा रहा था।  वहीं इसके कारण यह देश और हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी और सुदृढ हो गए है । यहां तो बगैर कहे पाक को भी मैसेज चले गया जिसकी बदौलत वो भी उछल रहा था ।  देखो आगे क्या होता है  । पर इस देश के नेतृत्व व सेना को नमन जिन्होने चीन को अपने जगह वापस करने मे मजबूर कर दिया  ।   बस इतना ही डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ

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