वैक्सीन की राह हम क्या पूरा देश और विश्व कैसे प्रतीक्षा कर रहा है यह अब कोरोना corona वैक्सीन से पता चल रहा है। आज वैक्सीन के खबर पर दुनिया की नजर लगी हुई है। वैक्सीन पर हमारे वैज्ञानिक कितना काम कर रहे है उस पर स्वंय प्रधानमंत्री ही नजर लगाए हुए हैं। देश मे इसकी उपलब्धता को लेकर भारत सरकार इस पर गंभीरता से इस पर रणनीति बनाई गई है। वहीं राज्य सरकारों ने भी अपनी कार्य योजना को कैसे अमलीजामा पहनाया जाये उस पर रणनीति भी करीब करीब बना ली है । पर वैक्सीन के खर्च का वहन कौन करेगा यह अभी भविष्य के गर्त में छिपा हुआ है। वैसे वैक्सीन हमारे स्वास्थय के राष्ट्रीय नीति का हिस्सा था । इसलिए हर वयक्ति का टीकाकरण एक राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल किया गया। इसलिए हम पोलियो जैसे बिमारियों पर अंकुश लगाने मे कामयाब भी हुए। इस पर देश के शासकीय स्वास्थय कर्मीयो की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने घर घर जाकर एक एक बच्चे का टीकाकरण किया। हमे याद है कि बचपन मे चेचक जैसे महामारी से भी लडा गया हर स्कूलों में जा जा कर टीका करण किया गया। बांह में दो बडे निशान के साथ वैक्सीन पहले बार मे अच्छे अच्छे को डरा ही देता था। एक विकसित देश होने के बावजूद हमने अपने कम संसाधनों के बाद भी उस पर विजय प्राप्त करने मे कामयाब हुए। वैसे ही क्षय रोग ( टीबी ) जैसे बिमारियों पर बीसीजी के राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत अंकुश लगाने मे कामयाब हुए। यही कारण है कि आज टीबी सेनोटोरियम का काम नहीं रह गया। आज रायपुर का टीबी सेनोटोरियम एम्स हास्पीटल में परिवर्तित हो गया है। पर यह टीकाकरण कब बाजारवाद मे बदल गया पता ही नहीं चला। आज भी सरकार शासकीय अस्पतालों के माध्यम से अपने दायित्व का निर्वहन कर रही हैं। पर उच्च वर्ग और मध्यम वर्गीय लोगों ने प्रायवहेट टीकाकरण को प्राथमिकता दी। यही कारण है कि टीकाकरण मे भी कम दर्द के टीके का इजाद कर या विज्ञापन के माध्यम से वैक्सीन का एक और महंगा विकल्प रखा तो उसे भी लोगों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। बच्चो के मामले मे कोई भी पालक हो कितना भी निम्न वर्ग का हो कभी भी नहीं बोल सकता। आज तो यही महंगे वैक्सीन चल रहे हैं। हो सकता है कि बच्चो को वैक्सीन का दर्द न महसूस होता हो पर पालक को दर्द का अहसास होता है। जिस पोलियो और ट्रिपल को मात्र बारह रूपये मे हम लोग लगाते थे। जिसमे दर्द और बुखार की दवाई पैरासिटामोल भी रहती थी । फिर शासकीय होने के बाद निःशुल्क हो गया। पर आज एक ही वैकसीनेशन का शायद दो हजार दो सौ या पांच रूपये के आसपास हो गया है। पर सरकार आज भी अपना दायित्व निभा रही है वहीं लोगों को जो ज्यादा सुविधा के कारण एक सामानांतर वैक्सीन का विकल्प खडा हो गया है। फिर अपने विषय पर कोविड का वैकसीनेशन अगर शासकीय होता है तो भी हमारा स्वास्थय अमला इतना काबिल है कि वो पूरे देश का टीकाकरण करने मे पूरी तरह से सक्षम है। पर इसे भी अगर प्रायवहेट किया गया तो वैक्सीन के कीमतों को नियंत्रित कर सरकार आम लोगों को मुहैया कराये । इससे वैकसीनेशन मे काफी जहां तेजी आएगी वहीं कम समय मे वैकसीनेशन होकर यह देश कोविड मुक्त होने की तरफ अग्रसर होगा । बस इतना ही
डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ



