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विशेष लेख- न्याय की जगह लोगों को तारीख पर तारीख मिल रही, फैसले का सालों साल इंतजार


डा.वाघ की वाल मे आज देश के एक सबसे बडी आम समस्या अगर लोगो की है तो लोग-बाग को न्याय सुलभ नही हो पा रहा है । न्यायालय स्वंय ही मानता है की प्रत्येक न्यायधीश के पास जरूरत से ज्यादा मामले है । आम नागरिक परेशान है की उसे न्याय की जगह ” तारीख पर तारीख ” मिल रहा है । पर न्याय से कोसो दूर है । दुर्भाग्य से इस मसले को लेकर न्यायालय से लेकर विधि विभाग तक कोई भी गंभीर भी नही है कभी कोई इस समस्या को लेकर सार्थक सुझाव ला रहा है ऐसा भी कोई दूर दूर तक दिख नही रहा है । कोविड के समय वैसे ही न्यायालय का काम बहुत प्रभावित हुआ है । इसमे अगर लोगो के दो साल भी खराब हुए है । अभी भी न्यायालय मे ग्रीष्मकालीन छुटटिया चल रही है । जब देश मे हमारे सेना के जवान सीमा पर विपरीत परिस्थितियो मे अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे है । वही हमारी पोलिस विशेषकर यातायात वाले पोलिस 45  डिग्री कही कही तो 48 डिग्री सेंटीग्रेट पर अपना फर्ज निभा रहे है । कभी किसी ने सोचा है यह जवान इतने गर्मी मे कैसे अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा है । चिकित्सक तो कोई आदमी ही नही रहता न दिन न रात न गर्मी न बरसात चौबीस घंटे तीन सौ पैंसठ दिन के लिए तैनात रहता है । फिर रेल विभाग हो या परिवहन विभाग सब विपरीत परिस्थिती मे अपना काम सुचारू रूप से करते है । जिस दिन इनमे से एक भी विभाग यह बोलते नजर आएगा की इस भीषण गर्मी मे हम अपना काम नही कर सकते तो देश का कामकाज ही ठप्प हो जाएगा । सभी लोगो को अपने ड्यूटी व फर्ज की चिंता है सब तकलीफ के बीच मे अपने कर्तव्य करने को बाध्य है । पर जो बात सबके लिए लागू होती है  फिर यह बात न्यायालय पर ही क्यो नही लागू होती । न्यायालय मे ग्रीष्मकालीन छुटटिया क्यो दी जाती है । वैसे ही लोगो को न्यायालयीन फैसले का सालों साल इंतजार करना पडता है फिर यह अवकाश फैसलो को और लंबे समय के लिए और ढकेलती है । वैसे भी न्यायालय का काम विपरीत परिस्थिती मे नही होता वहां चैंबर मे एसी लगवाकर भी सामान्य वातावरण मे काम किया जा सकता है । जब देश गुलाम था तो उस समय की बात अलग थी । तब के मी लार्ड इतने गर्मी मे काम नही कर सकते थे । परन्तु आजादी के बाद भी हम उस गुलामी के दौर की कुव्यवस्था को आज तक क्यो ढोते चले जा रहे है समझ से परे है । एक तरफ सरकार व न्यायालय का कहना है की सबको न्याय मिलना चाहिए पर ऐसे मे कैसे न्याय मिलेगा यह भी समझने की जरूरत है । क्या कभी किसी चिकित्सक की मौत पर क्या कभी किसी पोलिस विभाग के कर्मी की मौत पर या कभी किसी रेल या बस के कर्मी की मौत पर  या कभी किसी बैंक कर्मी की मौत पर छुट्टी मिलती दिखती है । यह विभाग उसके बाद भी अपने काम पर कर्तव्य पर कैसे लगा रहता है । फिर यह न्यायालय मे ही छुट्टी देकर क्यो पूरी व्यवस्था को एक तरह से ठप्प कर दिया जाता है । जिन लोगो को इस दुख मे शामिल होना है वह शामिल हो सकते है पर पूरी व्यवस्था तो बच जाएगी । इससे ज्यादा तो शासकीय विभाग जो न्यायालय का हिस्सा बनते है उनका भी आर्थिक नुकसान बचेगा । वही एक आम आदमी का पूरा दिन बचेगा ।  वैसे भी जिस दिन छुट्टी घोषित होती है तो वकीलो की नाराजगी भी देखने को मिलती है । उसका कारण साफ है उनकी उस दिन के केस की तैयारी जाया जाती है वही महत्वपूर्ण आर्थिक नुकसान भी होता है । विशेषकर युवा अधिवक्ताओ व मध्यम व निम्न वर्गीय अधिवक्ता प्रभावित होते है । मेरा भारत शासन सर्वोच्च न्यायालय विथि विभाग सभी से अनुरोध है की इस लेख को ही मेरा अनुरोध या फिर मांग मानी जानी चाहिए ।  सभी छुट्टियां निरस्त कर न्यायपालिका मे अमूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है । मैने जो महसूस किया वह लिखा । न्याय हमारा मौलिक अधिकार है ।   ” सत्य मेव जयते  “
अंत मे ”  शांतता कोर्ट चालू आहे “
बस इतना ही
डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ

( यह लेखक के निजी विचार है )





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