वीरांगना झाँसी की रानी की 162 वीं बलिदान दिवस, जानिए उनसे जुडी बातें
देश झाँसी की रानी की 162वीं बलिदान दिवस को मना रहा है। उन्हें श्रृद्धा सुमन अर्पित करते समय मेरे मस्तिंष्क में प्रश्न उठा कि क्या बलिदान दिवस मनाकर ही देश के नागरिक अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर देगे ? या व्यवस्था परिवर्तन के लिये संघर्ष करने वाली महिलाओं के हक मे अपनी आवाज भी बुलंद करेंगे या नही ? एड. सुधा भारद्वाज, पिजड़ा तोड़ों अभियान के सदस्य, एनआरसी, सीएए, तथा एनपीआर का विरोध करने वाली महिलाऐं आज जेल के अन्दर है, जो व्यवस्था परिवर्तन के खिलाफ आवाज उठा रही है। उन महिलाओं का अपना कोई व्यक्तिगत हित नही है, उसके बाद भी वे जेल के अन्दर है और उन्हें जमानत भी नही मिल रही हैै।
18 जून 1858 को झाँसी की रानी की हत्या करवाई गई और हत्या करने वाले आज सत्ता में बैठे है। आज के अखबार में लद्दाख में खूनी संघर्ष में 20 शहीदों में से 16 के शरीर पर डंडे पत्थर जैसे हथियारों के वार के बेहद गैहरे जख्म है, प्रश्न उठता है कि सरहद पर खडे़ सैनिकों के हाथ में सुरक्षा हेतु रायफल या अन्य सुरक्षा हथियार क्यों नही थे ? और अगर थे तो उन्हें सरहद पर दुशमनों के सैनिकों पर गोली चालन का आदेश क्यों नही दिया गया ? भारत के 20 शहीद बेटे किसान परिवार से थे, और उनकी हत्या करवा दी गई। अगर कोई सैनिक अपनी सुरक्षा तथा भोजन एवं डियूटी को लेकर प्रश्न उठाता है तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है, उस पर कोर्ट मार्शल की कार्यवाही की जाती है। शहीदों के शरीर पर डंडे-पत्थर जैसे हथियारों के वार से स्पष्ट होता है, कि हमारी सरकारें सरहद पर काम करने वाले शहीदों की जान-माल की कोई सुरक्षा नही करती। गरीब किसान का बेटा रोजगार के आभाव में देश की सरहद पर देश की सुरक्षा के लिए शहीद हो जाता है। जिस दिन शहादत होती है उस दिन अखबार तथा इलेक्ट्रानिक मीडिया बहुत हाय तौबा मचाते है, उसके पश्चात् सैनिकों की विधवा पत्नि, बच्चे, बूढ़े माँ-बाप दरदर की ठोकरें खाते है, उनकी सुध लेने वाला कोई नही होता।
झाँसी की रानी तथा देश की सुरक्षा कर रहे नवजवानों को सही श्रृद्धान्जली तभी होगी जब देश पर कुर्बान होने वालों को पूरी सुरक्षा मुहिया कराई जावें, व्यवस्था परिवर्तन के खिलाफ आवाज उठाने वालों को जेल से रिहा किया जावे। देश बड़ा है प्रधानमंत्री नही इन्ही शब्दों के साथ शहीदों को सादर नमन्।




