आलेख – वैक्सीन को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने खत्म कर दिया संशय के बादल, राजनीतिक दलों में छाया धुंध
वैकसीन को लेकर कल प्रधानमंत्री मोदी जी के उदबोधन ने पूरे संशयों के बादल को ही हटा दिया। जहां जनता खुश है अपने को सुरक्षित महसूस कर रही है वही राजनीति दलों मे एक धुंध सा छा गया है । इससे बाहर कैसे निकला जाए यह यक्ष प्रश्न बनकर खडा हो गया है । वहीं जिस वैक्सीन से राजनीति की जा रही थी वह बात ही खत्म हो गई है । जब केंद्र सरकार के हाथ में वैकसीन था तब जिस प्रकार से योजनाबद्ध तरीके से अमल मे लाया गया वह काबिले तारीफ था । एक राजनीतिक लाभ न मिल जाए मोदी जी को यह चिंता खायें जा रही थी । फिर ऐसा लगा कि इस पर पूरा क्रेडिट मोदी जी ही ले गये तो हमारा क्या होगा । फिर क्या था सभी क्षत्रप वैक्सीन के लिए राज्यो की भागीदारी की बात करने लगे । यह मांग जनहित से ज्यादा स्वहित के लिए थी । फिर कया था केंद्र और राज्य मे सहमति बनी । फिर वैकसीनेशन की बात यही खत्म हो जानी थी । जिसका जितने की भागीदारी थी उस पर चलने वालो बात थी । फिर क्या था सबसे पहले तो सभी माननीय लोगों ने वैक्सीन निर्माता को ही निशाने मे लिया पहले बंदे ने सुरक्षा मांगी बाद मे वह विदेश ही चला गया । पर अब केंद्र से भी कुछ कहने की स्थिति मे नही थे । पहले तो फंड को ही लेकर रोना धोना किया गया । जब तुम्हारे पास फंड ही नहीं था यह बात वैक्सीन के अनुमति लेने के समय नहीं मालूम थी । फिर इन लोगों ने कुछ ही दिनों में वैकसीन के साथ जो किया यह इनके नीयत को और राजनीतिक ऐजैंडे को ही दिखा रहा था । यह राजनीतिक रूप से इस मामले मे इनकी पोल ही खुल गई। पहले तो छत्तीसगढ़ मे ही वैक्सीन के लिए एक अनोखी पहल की गई। यहां पर एपीएल बीपीएल-एपीएल का राजनीतिक खेल खेला गया । यह वैकसीन के माध्यम से यह संदेश दे दिया गया है कि हम और हमारी पार्टी बीपीएल के साथ खडी है । वैसे यहां छत्तीसगढ़ मे एपीएल के लोग कोरोना से तो पीड़ित ही नहीं हुए । फिर एपीएल वैक्सीन के लिए अपनी जान के लिए कहीं भी जाए । ऐसा कर इन्होंने अपने नकाब को उतार दिया। फिर आये एक राज्य विपक्षी शासित राज्यों मे जो समाचार आए वो तो पूरा ही हिला देने वाले थे । एक तरफ वैक्सीन की कमी का रोना वहीं दूसरी तरफ वैक्सीन को गड्ढे में डालकर जो नष्ट किया गया वह यह दर्शा रहा था कि वह वैक्सीन का उपयोग कर इस महामारी से लडना ही नहीं चाह रहे थे । इस महामारी के माध्यम से मोदी जी को ही यह असफल दिखाने की कोशिश थी । फिर पंजाब में भी वही खेल जो वैक्सीन मिली उसे प्रायवहेट चिकित्सको को उंचे दामों में बेचा गया फिर समाज सेवी चिकित्सको ने भी अपने कर्तव्यो का निर्वहन करते हुए डबल रेट में बेच दिया । पता चला कि तीन हजार दो सौ मे दो डोज के वैकसीन की कीमत हो गई। एक बंदे ने तो जितने कि वैकसीन नहीं लगवाई उससे ज्यादा का तो विज्ञापन मे नजर आ गया । स्थिति ऐसी आ गईं कि हाथ खडे करने के लिए मजबूर होना पड़ा । अंततः पुनः केंद्र सरकार को इस महा अभियान को अपने हाथ मे लेना पडा । अब लोगो मे विश्वास आ गया है कि अब वैक्सीन कुछ समय बाद लग ही जाएगा । यह जरूर है कि वैकसीन के आड मे इनकी नियत का पता चल गया । किसी के लिए भी यह लोग विश्वसनीय नहीं है। यह सिर्फ अपने राजनीतिक ऐजैंडे मे काम करते है । हर राज्य ने निराश ही किया है । वहीं दूसरी तरफ यह दल और उनके नेताओं ने तो वैक्सीन के लिए उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह खडा कर वैकसीनेशन के लिए अपने तरफ से बाधाये खडी कर दी । स्वास्थय कर्मियों को विश्वास मे लेने के लिए मशक्कत करनी पड रही है। जब तक अधिकांश जनता का वैकसीनेशन नहीं हो जाता तब तक खतरा तो बना हुआ है। सभी वर्गों का सहयोग की आवश्यकता है तभी कोरोना से लडाई लडने मे हम सक्षम होंगे। वहीं वह नेता जो अभी भी विरोध मे है अगर जिंदा रहेंगे तभी तो राजनीति कर पाएंगे । वैज्ञानिको का साधुवाद वहीं केंद्र सरकार को भी साधुवाद जिन्होने इस अभियान को अपने हाथों में लिया । हम होंगे कामयाब एक दिन मन मे है विश्वास बस इतना ही डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ




