आज हम एक देश एक चुनाव पर बात करेंगे। विविधताओं से भरा देश है । सबकी संस्कृति अलग है भाषायें अलग है । पर देश एक है । जब से एनडीए की सरकार आई है तो विशेषकर भारतीय जनता पार्टी का एक चर्चित ” एक देश एक चुनाव ” उनका हर समय यह इनके एक उददेशयो मे से एक है । इतना बड़ा देश है जहां स्थानीय निकायों के चुनाव से लेकर राष्ट्रीय चुनाव तक की प्रोसेस अगर गलत नहीं हू तो पांच साल तक लगातार चलते रहती है। दुर्भाग्य से इन दलों को भी यही प्रक्रिया इसलिए रास आती है कि इन्हे इसके माध्यम से बहुत राजनीति करने का मौका मिलता है। अगर चुनाव एक ही बार मे हो जाए तो यह राजनीतिक बंदे पांच साल के लिए बेरोजगार हो जाएंगे। वहीं इनको इस बात की भी चिंता रहती है अगर हारे तो सभी जगह हार का सामना करना पड़ सकता है। जो इनके राजनीतिक स्वास्थय के लिए अनुकूल नहीं है। हमारे यहां का चुनाव आयोग मे तो हर समय वयस्त रहता है। चलो आज इसी मुद्दे पर बात करे । चुनाव की प्रक्रिया अलग अलग होने से शासकीय अमला हर समय वयस्त रहता है। वहीं एक क्षेत्र के चुनाव के लिए बार बार उसी प्रक्रिया से गुजरना संसाधन को जाया करने से ज्यादा कुछ नहीं है। अगर एक बार मे ही चुनाव की प्रक्रिया चालू होती है तो यह हर समय के लिए इस देश के वरदान साबित होगा । पहले तो पूरे देश मे स्थानीय निकायों से लेकर संसद तक के चुनाव से बार बार के खर्च से बहुत राहत मिलेगी। फिर वहीं पुलिस बल अर्ध सैनिकों की बार बार की तैनाती से भी राहत मिलेगी। एक बार मे ही चयन प्रक्रिया से शासकीय कर्मचारियों को भी राहत मिलेगी। वहीं शासकीय कार्य में आने वाली बाधाओं से राहत मिलेगी। वहीं चुनाव के अलग अलग चरणों के कारण जो चुनाव के चलते आचार संहिता लगती हैं वह आचार संहिता भी एक ही बार लगेगी जिससे विकास के कामों मे आने वाली बाधाओं से भी निजात मिलेगी। वहीं दलों का चुनाव खर्च में भी काफी कमी आयेगी। एक बार के प्रचार मे ही काम चल जायेगा। इससे संसाधन का बेहतरीन उपयोग होगा। एक बार के चुनाव मे खर्च निपट जाने से ये पार्टीया भी खर्च के मामले मे गंगा नहा लेगी । वहीं बार बार की चंदा उगाही भी रूक जायेगी। इससे भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगेगा। पर यह दल व नेता ऐसा नहीं चाहेंगे। क्योकि चुनाव के कारण इनकी पूछ परख बंद हो जाएगी। वहीं चुनाव के नाम मिलने वाला पर्यटन मे भी रोक लग जाएगी। वहीं चंदा मिलना भी बंद हो जाएगा। पर सबसे बडी इनकी तकलीफ है कि इनको जो राजनीतिक मौके मिलते है वो मिलना बंद हो जाएगा। यहां तो ऐसा है विधायक से हारो तो सांसद के लिए प्रयत्न कर टिकट ले लो । अगर सांसद से हारो तो विधायक के लिए कोशिश करो पर एक बार के चुनाव मे यह सब संभावना पर विराम लग जाएगा । तो भी इन्होंने निगम मंडल आदि की स्थापना कर अपने खर्च का संसाधन बना ही लिया है। असली बात तो यह है कि इन नेताओं को देश से और उसके संसाधन बचाने से कोई लेना देना नही है । यह लोकतंत्र तो इनके लिए राजनीति का और सियासत का खेल है । यह देश मैदान में इन्ही खिलाड़ियों परिवारो को ही देख रहा है। आम नागरिक तो मूक दर्शक बन कर इन्ही मे से एक का चुनाव करने के लिए बाध्य है । समय आ गया है कि मोदी जी इस पर भी निर्णय ले । इससे एक फायदा यह होगा कि हर दल निकायों के स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर नीति साफ करेंगे। वहीं हमारे मतदाता इतने परिपक्व है कि हर स्तर पर अपने प्रतिनिधि चुनने मे सक्षम है। इसमें थोड़ा सा उन लोगों को जरूर नुकसान है जिनको हर चुनाव मे पीने को मिलता है उस पर सिर्फ उन्हे ऐसा करने का एक ही बार मौका मिलेगा। जो भी हो इस पर अब हर मंच से हर जागरूक नागरिकों को आवाज़ उठाने की आवश्यकता है । एक देश एक चुनाव पर आने वाले दिनों में हमे इसमे सफलता मिलेगी। इसी आशा के साथ । बस इतना ही डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ
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