कल मैंने छत्तीसगढ़ के व्यंजन को जहां छोडा था उसे आगे बढा रहा हू । बहुत अच्छी प्रतिक्रिया आई है । कुछ नये व्यंजन जिनके नाम जिनसे मै भी परिचित नहीं था । उसे दीदी श्री मती सविता पाठक जी ने उल्लेख किया है। जिसे मै अपने लेख मे आगे लूंगा। अभी मै सब्जियों मे ही उलझा हुआ हू । जिसमे यहां के लोग लौकी की सब्जी दही मे अच्छे से बनाते है । पर मै उस सब्जी का जरूर उल्लेख करूंगा जिसके बगैर सब्जी का उल्लेख खत्म नही होगा। मै अब उस सब्जी के बारे में बताना चाहूंगा जो अब आधुनिकता के चक्कर भेंट चढ़ गई है । आज से एक दशक पूर्व जब लोग अपने पूरे परिवार के साथ जब राजिम मेला जाते थे तब रात को राजिम रोड मे आवास होने के कारण और लाईट के उपलब्धता के चलते गाडी वाले रुकते ही थे । फिर उन लोग कंडे को सुलगा कर फिर उसमें अंगाकार रोटी और बैगन का भरता बनाते थे । क्या भीनी भीनी खुशबू दिल खुश हो जाता था खाने का मन लालायित हो जाता था । गांवो में अभी भी बनता होगा पर बाहर बनाकर खाने का आनंद ही कुछ आनंद और रहता रहा होगा । फाइव स्टार होटल की टेस्ट भी इसके सामने शर्मा जाए । यहां पर बफौरी कढी भी काफी स्वादिष्ट बनाई जाती है। इस क्रम में किसी के पास कोई और जानकारी हो तो बेहिचक पोस्ट मे शेयर करे जिससे इस अंचल की सब्जी का लोग आनंद ले सके । अभी मै आप लोगों को नाश्ते की दुनिया के तरफ ले चलता हू । छत्तीसगढ़ के जानने वाले एक गाना बहुत सुने होंगे ” गुल गुल भजिया खा ले ” यह जो गुल गुल है वो है गुड से बना मीठा भजिया गुलगुला है । क्या स्वाद जो आदमी मीठा नहीं खाता वो भी एक बार मांगने के लिए मजबूर हो जाऐगा। दूसरा वो डायलाग ” कब बबा मरही और कब बरा खाय बर मिलही ” । निश्चित छत्तीसगढ़ के लोगों के हाथो के बरे की बात ही कुछ और है । हालांकि यह बड़ा करीब करीब सब जगह बनाया जाता है पर यहां के लोगों के बडे मे एक अलग स्वाद मिलता है। विशेषकर पितर मे तो बनता ही है। अब मै उस स्वाद की तरफ बढ रहा हू वो है आम लोग भी जानते है कि यह छत्तीसगढ़ के व्यंजन का स्वादिष्ट नाश्ते में शुमार है । वो है खुरमी ठेठरी खुरमी मीठी और ठेठरी नमकीन होती हैं। खुरमी ठेठरी दोनों नाश्ते को आप लंबे समय तक रखकर उपयोग कर सकते हैं । मेरे को अच्छे से याद है हमारे यहां काम करने वाली जिनको यहां रौताइन कहा जाता है बिसाहिन बाई हम लोगों के लिए जरूर लाती थी । मेरे मित्रो खाइये आप निरूत्तर हो जायेंगे। लेख बड़ा हो रहा है पहले सोचा था कि आज खत्म कर लूंगा। पर संभव नहीं दिख रहा है यह क्रमशः आगे भी जारी रहेगा। बस इतना ही
डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ




