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वीडियो में देखिए एर्राबोर का सच, विष्णु सरकार के पुनर्वास नीतियों से बदल रहा छत्तीसगढ़

18 साल बीत गए लेकिन एर्राबोर के लोग आज भी उस खौफनाक मंजर को नहीं भूले। चारो तरफ धधकती आग, चीख पुकार, अपनो की आंखों के सामने अपने ही जल गए। महिलाए और बच्चे भी इस त्रासदी का शिकार हुए। आज भी ये घटना एर्राबोर के लोगो जेहन में जिंदा। इस खौफनाक मंजर को आज भी एर्राबोर के लोग नहीं भूल पाए। अपनो को खोने के गम में कई परिवार आज भी इस घटना को याद कर सहम जाते है। हम बात कर रहे है छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के ग्राम एर्राबोर की।

आज से 18 साल पहले नक्सलियों ने यहां आधी रात को सैकड़ों घरों (झोपड़ियों) में आग लगा दी थी। घटना में 50 से ज्यादा लोग जिंदा जल गए, उनकी दर्दनाक मौत हो गई। एर्राबोर के लोगों के आंखो में ये दृश्य आज भी जीवंत हैं। बताते है यहां सलवा जुडूम का राहत शिविर लगा था। अचानक बड़ी संख्या में नक्सली पहुंचते हैं। कुछ ही देर में गोलियां चलने की आवाजें आने लगती हैं। इससे पहले कि जवान या पुलिस कुछ समझ पाती, नक्सलियों ने वहां सैकड़ों घरों (झोपड़ियों) में आग लगा दी। जवान मौके पर पहुंचे भी, लेकिन तब तक नक्सली भाग चुके थे।

इस घटना में 50 से ज्यादा ग्रामीण मारे गए, कुछ जिंदा ही जल गए। हालात बदले हैं, लेकिन ग्रामीणों के कानों में अब भी चीखने-चिल्लाने की आवाजें गूंजती हैं। 18 साल बाद इस घटना पर सुकमा के आदर्श पांडेय ने डॉक्यूमेंट्री बनाई है। इसे छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने ऑफिशियल सोशल मीडिया अकाउंट पर भी शेयर किया है।

आदर्श बोले- घटना के बारे में सुनकर रोंगटे खड़े हो गए

डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले आदर्श ने बताया, ‘माओवादियों के खिलाफ चल रहे अभियान और आदिवासियों के संघर्ष से जुड़ी कई घटनाओं पर नजर पड़ी। जिस दौरान एर्राबोर आदिवासियों के कैंप पर हमला किया गया था, उस समय मेरी उम्र करीब 8 साल की ही थी। शुरुआत इसी डॉक्यूमेंट्री से की। घटना के बारे में सुनकर रोंगटे खड़े हो गए थे।’

सरेंडर्ड नक्सली बोले- हमें नहीं बताया गया था

आदर्श ने बताया कि, हमले में शामिल जिन नक्सलियों ने सरेंडर किया है उनसे भी बातचीत की गई थी। उनका कहना है कि माओवादियों से चर्चा से यह पता चला कि उन्हें भी टॉप लीडर्स ने यह नहीं बताया था कि वे उनके ही लोगों की हत्या करने के लिए ट्रेनिंग देकर ले जा रहे हैं। यह निश्चित तौर पर बेहद भयावह हत्याकांड है। इस बात का अफसोस हमें आज भी है।

डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले आदर्श ने बताया, ‘माओवादियों के खिलाफ चल रहे अभियान और आदिवासियों के संघर्ष से जुड़ी कई घटनाओं पर नजर पड़ी। जिस दौरान एर्राबोर आदिवासियों के कैंप पर हमला किया गया था, उस समय मेरी उम्र करीब 8 साल की ही थी। शुरुआत इसी डॉक्यूमेंट्री से की। घटना के बारे में सुनकर रोंगटे खड़े हो गए थे।’।

आदर्श ने बताया कि, हमले में शामिल जिन नक्सलियों ने सरेंडर किया है उनसे भी बातचीत की गई थी। उनका कहना है कि माओवादियों से चर्चा से यह पता चला कि उन्हें भी टॉप लीडर्स ने यह नहीं बताया था कि वे उनके ही लोगों की हत्या करने के लिए ट्रेनिंग देकर ले जा रहे हैं। यह निश्चित तौर पर बेहद भयावह हत्याकांड है। इस बात का अफसोस हमें आज भी है।

आदर्श ने छत्रपति शिवाजी इंजीनियरिंग कॉलेज भिलाई से रोबोटिक्स में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। हाई स्कूल तक की शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर सुकमा के बाद हायर सेकेंडरी की शिक्षा हम एकेडमी जगदलपुर से की। इसके बाद 2023 में FTTI की परीक्षा के लिए एक साल तक दिल्ली में पढ़ाई की और परीक्षा भी दी। FTTI की तैयारी के दौरान सिनेमा निर्माण से जुड़े बहुत से लोगों से मुलाकात हुई। वे कहते हैं मैं स्क्रिप्ट लेखन और निर्देशन के लिए स्वयं को तैयार कर रहा हूं।

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