विशेष लेख – राजनीति और समोसे का यथार्थ, जबरदस्त है समानता, गर्मागर्म मामला ही सबकी पसंद

डा.वाघ की वाल मे राजनीति और समोसे पर एक यथार्थ का व्यंग्य लिखने की कोशिश कर रहा हू पता नही इसे आप लोग-बाग कैसे लेते है । नब्बे की दशक मे एक नारा बहुत गूंजा था ” जब तक समोसे मे रहेगा आलू तब तक बिहार मे रहेगा लालू ” । आज इस विषय को ही मै आधार बना रहा हू । किसी भी होटल मे कोई भी ग्राहक जाता है तो गर्म समोसे देखकर न खाने की इच्छा होते हुए भी खा लेता है । बस यही बात यहां भी होती है चुनाव मे किसी पार्टी का नया उम्मीद वार होता है तो लोग-बाग उसे समोसे जैसा हाथोंहाथ उठा लेते है । पर जब ठंडा समोसा रहता है तो ग्राहक भी हाथ लगाकर देखता है और कोई नाश्ते का ऑप्शन नही होता तो बेमन से उसे खाता है । बस चुनाव मे कोई दल किसी उम्मीदवार को फिर से टिकट देता है तो होटल वाले की विश्वसनीयता देखकर जैसे लोग समोसा खाते है वैसे ही दल के नाम से पुनः जीता देते है । पर जब दुकानदार अपनी विश्वसनीयता के उपर ज्यादा विश्वास करके बासी समोसे को फिर से तलकर गर्मागर्म कर ग्राहक को बेचने की कोशिश करता है पर अंदर का मसाला बासी होने के उतर जाता है तो ग्राहक मुंह से तुरंत निकालकर फेंक देता है । बस यहा भी ऐसे ही होता है जब किसी खारिज उम्मीदवार को पुनः नये कलेवर के साथ पार्टीया उसे ही रिपीट करती है तो लोग भारी वोटो से उसे हरा देते है ।कही कही तो जमानत तक जब्त हो जाती है । इसके बाद भी कुछ होटल वाले चतुर होते है जब तक पूरे समोसे बेचने के लिए समोसे को सुरक्षित फ्रीजर मे रख पुनः कढाई से निकालते है तबतक उन लोग ताजा समोसा नही बनाते । बस यहा भी यही हालत है पार्टीयां नये लोग को मौका नही देती उसी खांटी के नेताओ को उम्मीदवार बना देती है जिस तरह ग्राहक के पास दूसरे नाश्ते का विकल्प नही रहता न चाहकर भी खाता है यहां भी इसी उम्मीदवार को जीताता है । फिर यहां जिस तरह से दल वंशानुगत होकर टिकट देती है जिसमे पत्नी पुत्र लडकी शामिल होती है और उम्मीदवार बनती है यहां भी कमोबेश ऐसा ही होता है । समोसा का मसाला पहले से ही बना रहता है और होटल वाला समोसे की उपर का आवरण या लेयर या जिसको होटल वाले अपनी भाषा मे पट्टी कहते है बस वही बनाता है और मसाला तो पुराना ही रहता है फिर से उसको निकाला जाता है । बस यही काम यह दल वाले करते है पूरी पृष्ठभूमि वही रहती है बस पट्टी अलग रहती है । अगर मसाला ठीक-ठीक रहा तो समोसा निकल जाता है नही तो डंप हो जाता है । कुछ वंशानुगत के मटेरियल चल निकलते है तो कुछ पहले ही बार मे आऊट हो जाते है । जब आप घर के लिए आलू लेते है तो छांटकर लेते है पर होटल मे थोक के भाव मे बगैर छांटे आलू लिए जाते है जिसमे सडे गले आलू भी खप जाते है उसे वैसे ही उबालकर समोसे के लिए लिया जाता है अंदर से कभी भी ग्राहक वाकिफ नही होता की कैसे आलू का उपयोगमे लिया गया है । वैसे ही पार्टी भी सत्ता मे आने के लिए चरित्रहीन गुंडा माफियाओ भ्रष्ट आदि का मसाला बनाकर अपने पार्टी के पट्टी मे भरकर समोसा बनाकर टिकट देकर देती है यह लोग माननीय के दौड मे शामिल हो जाते है बन भी जाते है । पर उस उपभोक्ता को नही पता रहता की वह सडे हुए आलू का समोसा खा रहा है वह तो होटल की विश्वसनीयता पर खा रहा था । कभी कभी समोसा नही बिकता पर खोमचे ठेले वाले या होटल वाले भेल मे काम मे ले लेते है वैसे ही यहां भी जो हार जाता है या प्रत्याशी नही बन पाता वह मंडल निगम आदि संस्थान मे समाहित कर उसे पद से नवाज कर सुविधाओ से युक्त हो जाता है । समोसा तो एक ही होता है पर उसके बाजार मूल्य उसके स्टेट्स तय करते है । खोमचे वाले सस्ते होटल थोड़ा-बहुत उससे ज्यादा पर एयरपोर्ट मे फाइव स्टार के अलग यह सब भी राजनीतिक गलियारे के समोसे का हाल रहता है यहां भी लोकसभा राज्यसभा विधानसभा मे सुशोभित लोग अधिक मानदेय पावरफुल होते है फिर उसके नीचे के लोग जिला पंचायत महानगर पालिका नगर निगम को सुशोभित करते है सबसे अंत मे पंचायत मे समाहित होते है । कभी-कभार समोसे खत्म होने पर या मिस्त्री न आने पर होटल मालिक संबंधो के आधार पर कही दूसरी जगह से समोसा लाता है वैसे ही चुनाव के समय लोग-बाग दलबदल कर प्रत्याशी बनते है । समोसा वही पर होटल अलग । कभी इच्छा होती है की समोसे के दौड मे शामिल हुआ जाए सब अच्छा रहता है पर दुर्भाग्य से समोसे को सजाने वाली वस्तुओं जिसमे मीठी चटनी बम चटनी दही चटनी और तली हुई मिर्च न रहे तो वह स्वाद नही बन पाता । यह राजनीतिक गलियारे मे यह चीज है पैसा दारू और समाज के मिर्च का कांबीनेशन नही है तो समोसा कितना भी अच्छा हो नही बिक सकता । धोखे से बिक गया तो वह स्वाद अंत तक बना रहता है । यह समोसा जनता के हित मे अपने को समर्पित कर देता है । सत्ता मे रहा तो जनहित कार्य विपक्ष मे रहा तो जनहित मुद्दे उठाकर लोगो के आशा के अनुरूप उतरने की कोशिश करता है । वही समोसा को लेकर होटल मालिक तय करता है वही राजनीतिक गलियारे मे हाईकमान तय करता है । कुल मिलाकर सेठ के हाथो मे सबकुछ है ।
बस इतना ही
डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ




