विशेष लेख- नजर मे देश सेवा दूसरे नजर मे विद्रोही देखने का अपना अपना नजरिया

डा.वाघ की वाल मे आज सियासत की दोस्ती पर बात करेंगे । जब आम आदमी भी किसी से मित्रता करता है तो पहले अच्छे से परख लेता है । दोनो ही तरफ इस साधारण सी मित्रता के साथ नफा नुकसान भी जेहन मे आता है । इस बात से कोई इंकार नही करेगा की बडे लोगो से दोस्ती करने को सब उतावले रहते है । गरीबो का तो कभी कोई दोस्त नही रहता कही रहता भी है तो वह कभी जिक्र मे भी नही आता । खैर सियासत फिर इससे कैसे अछूती रहती । यही कारण है की सभी क्षेत्रो के लोग अपनी प्रतिभा को भुनाने के लिए यहां चले आते है । जब तक ठीक ठाक दाम मिलता है तब तक ठौर ठिकाना बना रहता । कोई सिद्धांत की राजनीति करता है यह सब बेकार की बात करते है । राजनीति अपने लिए की जाती है अपने स्वार्थ के लिए करते है । पर इस देश मे सियासत के साथ आजादी के पहले से एक व्यवसाय राजनीति से जुडा है तो वह व्यवसाय अधिवक्ता का । आजादी के समय भी इन अधिवक्ताओ ने अपने व्यवसाय के साथ देश की सेवा तभी तक की जब तक उनके राजनीतिक हित उससे सधते रहे । देश की सेवा करने का जो दिखावा है जैसे आज भी कुछ अधिवक्ता अपने तरीके से कर रहे है उससे ज्यादा कुछ अलग नही है । अगर देश सेवा करने वाले नेताओ ने तो अपनी आईसीएस तक के पदवी को लात मार दिया । वही एक क्रांतिवीर की बैरिस्टर की डिग्री को भी व लाइसेंस तक नही दिया गया । एक नजर मे देश सेवा दूसरे नजर मे विद्रोही देखने का अपना अपना नजरिया । देश के बडे बडे आजादी के दिवाने बैरिस्टर के रहते भगतसिंह सुखदेव व राजगुरू को फांसी यह उनके व्यवसाय के लिए कालिख थी जो उन्होने सजाने के लिए रखी थी वही राजनीति का एक राजनीतिक अंग से ज्यादा कुछ नही था क्रांतिकारी कुछ भी करे हिंसा पर सरकार फांसी पर भी चढा दे यह अहिंसा । यह दोहरापन आजादी के बाद भी चलता रहा । खैर मै आज के दौर मे आता हू आज भी इस व्यवसाय के बडे बडे नाम राजनीतिक दलो का हिस्सा है कोई भी दल इससे अछूता नही है । अधिवक्ता कानून का ज्ञाता कहा कितना बोलना है कैसे बोलना है जिससे राजनीतिक हित साध सके । यही कारण है की इन राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के प्रवक्ता बडे बडे वकील रहे है । जिन्होने बाद मे काबीना मंत्री पद भी संभाला है । इन अधिवक्ताओ ने दल के लिए काम किया वही अपने नेताओ के केस भी लडे । सब राजनीतिक दल का अपना स्टैंड रहता है । कुछ सालो से विशेषकर मोदी जी के आने के बाद तो यह ज्यादा देखने मे आया है । दुर्भाग्य से मोदीजी का विरोध करते करते यह लोग राष्ट्र विरोध मे भी अपने को लिप्त कर लिए जब यह लोग लिप्त हो गए तो उनकी सेवा मे शामिल यह अधिवक्ता कैसे इससे बच सकते थे । फिर सरकार के साथ देश व विदेश मे जितने भी मामले गये उन सभी मामलो मे कुछ चित परिचित अधिवक्ताओ के चेहरे सामने आने लगे । हालात तो यह हो गए की हर मामलो मे देश विरोधी चेहरा भी देश के नजर मे आने लगा । जैसा मैने उपर भी लिखा है पूरी दोस्ती लेन-देन पर ही निर्भर रहती है । यहां भी कमोबेश यही डीलिंग का आधार रहता है । तुम मुझे पद दो मै तुम्हे व दल को सभी कानूनी पेचदगियो से बचाऊंगा कोई घाटे का सौदा नही है । एक तरफ सांसद को मिलने वाली सुविधाओ के चलते भीड से अलग तो दूसरी तरफ अपनी राजनीतिक सियासत से देश के ही संसाधन से पूर्णतः कानूनी रक्षा कवच जो आपको हर अनैतिक कामो के कानूनी झंझावात से बचाने का काम करेगा । यह लोग पहले नेताजी परिवार फिर दल परिवार का हिस्सा सा बन जाते है । जस्ट लाइक ए फैमिली डाक्टर। यह ऐसे अधिवक्ता रहते है जिनके सीनो मे कई राज छिपे रहते है । कुल मिलाकर यह ऐसा फेवीकोल का गठजोड है जो अनैतिक कामो और निजी हितो के लिए बनता है । यह आज भी है और आजादी के पहले भी था यहा बस फर्क यह था की उस समय यही काम अंग्रेजो के लिए किया करते थे । यही कारण था की आजादी के आंदोलन मे पंच सितारा जेल व सर्वसुविधा युक्त मिला करती थी । जहा एक तरफ काला पानी की सजा थी तो दूसरे तरफ इन लोगो ने लाठी तक नही खाई । न्याय का सिद्धांत भले निन्यानबे अपराधी बच जाए पर एक भी निर्दोष को सजा नही मिलनी चाहिए । बस इसका सहारा लेकर देश को जहा खामियाजा भुगतना पडता है वही इनके कानूनी बारीकीयो के ज्ञान के चलते निनानबे प्रतिशत अपराधी बेखौफ घूमते है ।
आज पूरा देश यही देख रहा है ।
बस इतना ही ।
डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ





