छत्तीसगढ़

सन्डे की चकल्लस, रायपुर की छात्र राजनीती (भाग – 7) – छात्रा ने मार दिया था मंत्री को झापड़, दो महीने तक जेल में बंद रहे थे 60 छात्र

ल के भीतर से खबरें आ रही थी कि जल्दी आओ यहां बहुत अच्छा खाना मिल रहा है । बाहर हर छात्र को पैसे की तंगी के कारण वे भी मानसिक रूप से अंदर जाने के लिए बेताब थे । छात्र आंदोलन की वजह से गिरफ्तारी के कारण छात्रों को बडे बैरकों मे रखा गया

छात्रों को ट्रेन से उतारना पुलिस वालों को भारी पड़ गया, ट्रेन में बैठाकर छात्रों को भेजना पड़ा

रायपुर में छात्र राजनीति ( भाग – 7 ) – सन 1977- 1978 की आपातकाल के बाद पूरे देश में जनता पार्टी की सरकार बनी थी । तत्कालीन मध्यप्रदेश में भी छत्तीसगढ़ भी उसका हिस्सा था यहां भी जनता पार्टी की सरकार बनी थी। उस समय मध्यप्रदेश के आयुर्वेदिक कालेज के छात्रों ने असमानता हटाने के लिए बहुत बड़ा आंदोलन किया था। बाकी कालेज के छात्र भी उनके समर्थन में उतर गए थे। आयुर्वेदिक कालेज रायपुर के पचास साठ छात्र तब के मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रदर्शन कर ज्ञापन सौपने निकले। उनके पास पैसा कम था तो तय कर लिया गया कि ट्रेन में बेटिकिट जाएंगे। टीटी आया तो छात्र होने और आंदोलन के लिए भोपाल जाने की वजह बताकर बेटिकिट होने की बात बताई। टीटी ने सभी छात्रों को नागपुर मे रेल्वे पुलिस के हवाले कर दिया ।जब हमारे चाय और नाश्ते खा समय हुआ तो थाना प्रभारी से छात्रों ने ने नाश्ता चाय मांगा तो पहले तो अपने पैसो से पीकर आ जाओ कहा फिर छात्रों ने पैसे नहीं होने का हवाला दिया साथ ही कहा कि हम आपकी कैद में हैं, हमें खिलाने पिलाने की जिम्मेदारी आपकी है। छात्रों को चाय नाश्ते और खाने के बाद थाना प्रभारी परेशान हो चुके थे। अपने एक अधीनस्थ को कहा जो भी ट्रेन दिल्ली की तरफ जा रही रही हैं, उसमे इन लडकों बैठा दो।

इसके बाद छात्रों का काफिला भोपाल पहुंचा। जैसा कि उस समय रिवाज था कि छत्तीसगढ़ से किसी काम से पहुंचे लोग विधायक आवास परिसर में ठहरते थे। ये छात्र भी आवास परिसर के बड़े बड़े बरामदों में अस्थाई निवास बना लिए। वहीं विधायकों के मेस मे ही कम दरों का शासकीय खाना खाते थे। फिर प्रदर्शन करने निकल जाते थे। वहां रहने से एक फायदा यह भी था कि अपनी मांगों के लिए विधायकों से मिलने मे सहूलियत भी थी । तब के रायपुर ग्रामीण और शहर के विधायक रजनी ताई उपासने और रमेश वर्ल्यानी से भी वे मिले। पूरे प्रदेश के लडके आए हुए थे रोज सौ डेढ सौ आंदोलन कर गिरफ्तारी की योजना थी । दस- दस, बीस – बीस छात्रों की हर दिन जेल जाने की योजना बनी थी।

कहते हैं ना कि दोस्त दुखी हो जाए तो उसे सांत्वना देकर उसे दुख को दूर करने की कोशिश की जाती है। वही दोस्त को सुखी देखकर जलन होती है। यही हाल इन छात्रों का भी था। जेल के भीतर से खबरें आ रही थी कि जल्दी आओ यहां बहुत अच्छा खाना मिल रहा है । बाहर हर छात्र को पैसे की तंगी के कारण वे भी मानसिक रूप से अंदर जाने के लिए बेताब थे । छात्र आंदोलन की वजह से गिरफ्तारी के कारण छात्रों को बडे बैरकों मे रखा गया था । जेल के भीतर जाते ही नीचे बिछाने के लिए दरी ओढने के लिए जेल का बहुचर्चित कंबल और खाने के लिए वह सफेद वाली बहुचर्चित प्लेट व बर्तन उन्हें दिया गया। जैसे खबरें बाहर के छात्रों तक पहुंचाई जा रही थी, उसमे सच्चाई एक रत्ती भर नहीं थी । पहुंचने के बाद उन पहले वालो की खुशी का अंदाजा नहीं था उनको लग रहा था कि यहां की तकलीफ अकेले क्यो झेले । दरी बिछा दी गई काफी लडके थे तो समय काटने की उतनी चिंता व मुश्किल नहीं थी । पर उन आदतों को जो जेल मैनुअल मे रहते है उसमें अपने को डालना बहुत मुश्किल काम है। अगर आप सबेरे जल्दी उठ गये तो आपके नित्य काम जल्दी और अच्छे से हो जाते है । बाद की भीड और वहां की व्यवस्था उन्हें परेशान कर देती है ।

गिनती के टायलेट उसमें भी लंबी लाइन छात्रों को परेशान कर देता था। चाय बिल्कुल अहसास कराती थी कि तुम अब कहा हो । चाय मिलती थी मगर चाय जैसी लगती नहीं थी। इस वजह से चाय की तलब हमेशा लगी रहती थी। गर्मी के दिन थे।इतने बडे हाल मे मात्र दो तीन लगे थे। शायद पंखे की गति देखकर यह लगता था कि पंखे को मन रखने के लिए रखा गया है। हंसी मजाक इतने लोगों के बीच समय निकालने का माध्यम था । खाने के लिए वो प्लेट जो तामचीनी के बने रहते है उसे दिया जाता है। बडे बर्तन मे खाना आता था वो लंबी लाइन फिर दो लाइनों मे लगकर लेना रहता था । जेल की वो स्वादिष्ट रोटी जिसे दोनों हाथो से तोडना पड़ता था कई बार तो कोशिश करनेके बाद भी नहीं टूटती थी । फिर वो दाल खासकर उडद व चने दाल की दाल जो सागर में मोती ढूंढने से कम नहीं रहता था । सब्जी मे कद्दू लौकी और बैगन का ज्यादा उपयोग होता था । पर साथ मे थे तो जब एक लाइन इतनी लंबी रहती थी कि भूख के चलते कुछ लोग सूखी रोटी खा लेते थे ।

छात्रों को दिन में पता नहीं चलता था पर रात तो कयामत की रात रहती थी इसलिए देर रात सोते थे। रात मे मच्छर के काटने से अगर जेल का कंबल उससे बचने के लिए ओढो तो जहां कंबल गड़ता था। वहीं गर्मी से बुरा हाल हो जाता था। छात्रों को आम कैदियों की तरह सी क्लास की ट्रीटमेंट दी जा रही थी तो एक दिन सभी लडको ने आमरण अनशन किया। इससे जेल प्रशासन भी थोड़ा चिंतित हुआ उस समय जेल मंत्री स्व. पवन दीवान जी थे । उनके पास बात पहुंच उन्होंने रायपुर मे रहे जिलाधीश रहे रविन्द्र शर्मा जी तब मंत्रालय में सचिव थे उन्हें छात्रों से मिलने भेजा । उसी समय रविशंकर विश्व विद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष व तत्कालीन जनता पार्टी के नेता स्व. प्रकाश शुक्ला भी छात्रों से मिलने जेल पहुचे । इसके बाद छात्रों को बी श्रेणी मे रखा गया । वहां फिर ब्रेड दूध अंडे दिये जाने लगे । शुरुआती आंदोलन कारी छात्र छह सात दिन बाद छूट जाते थे। आंदोलन के दौरान ही रींवा से आई एक छात्रा ने मंत्री जी को झापड़ मार दिया। इसके बाद सभी छात्रों को जेल में ठूंस कर दो महीने तक बन्द रखा गया। साभार – डॉ चन्द्रकान्त वाघ

(संकलनकर्ता- अजय कुमार वर्मा पेशे से सरकारी कर्मचारी हैं )

Related Articles

Back to top button