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विदेश यात्रा संस्मरण – मुझे एक अज्ञात भय जरूर लग रहा था जो मै कह नहीं पा रहा था

विदेश यात्रा का संस्मरण ग्यारह अब हम फ्रांस के छोटे-छोटे गांवों से निकल रहे है तब तक शाम होने लगी थोडा अंधेरा भी होने लगा पर अभी हम किस देश मे चल रहे है पता भी नहीं चला रहा था । रास्ते मे कम भीड़ यहां का एक ही हिस्सा है ।  पर यह महसूस होने लगा कि हम अब मुख्य मार्ग मे आ गए है ।  जीपीएस के कारण कहीं भी दुविधा नहीं थी इसलिए कहीं भी कुछ पूछना की आवश्यकता भी महसूस नहीं हुई  । अब यात्रा शाम से रात्रि की ओर अग्रसर हो रही थी करीब करीब पूरा ही अंधेरा छा गया था।  शायद हम स्विट्जरलैंड की सीमा मे ही दाखिल हो चुके थे। धरती की जन्नत मे आने की खुशी बहुत हो रही थी । पर अंधेरे के कारण साफ दिखाई नहीं दे रहा था ।  पर कस्बे जैसे गांव जरूर निकल रहे थे । हमे ‘ वेलिसेलन ‘  नामक जगह मे हमारा रिजर्वेशन था ।  सौरभ पूरे ही आत्म विश्वास मे था । पर मुझे एक अज्ञात भय जरूर लग रहा था जो मै कह नहीं पा रहा था । कुछ देर होने के कारण यह लग रहा था कि हम सही चल रहे है कि नहीं।  यह बात मै औरो से नहीं कह पा रहा था । खामोखां दूसरे भी न डर जाए । मेरे को यह महसूस होता था कि कुछ हो जाएगा तो हमारी मदद यहां कौन करेगा।  हम अपने ही देश के दूसरे शहर मे अंजान होने पर असहाय महसूस करते है फिर यह तो दूसरा देश है   । खैर हम आखिरकार वेलिसेलन पहुंच ही गए ।

वेलिसेलन

वैसे ज्यादा रात हुई नहीं थी ज्यादा से ज्यादा रात के साढे आठ से नौ के बीच का समय  रहा होगा ।  पर कोई भी बंदा बाहर नहीं दिखाई दे रहा था । हम गांवों के बीच से जीपीएस के बताये अनुसार आगे बढ रहे थे । वहां के मकान को देखकर कुछ नयापन सा लगने लगा था।  सडके इतनी चौडी थी कि खुली सडकों पर ऐसा घूमने का मौका भी पहले बार मिल रहा था । बस हम अपने मंजिल के करीब पहुंच चुके थे ।  फिर आखिर वेलिसेलन मे जहां हमे रूकना था पहुंच गए।  फिर क्या था गाडी भी बाहर ही पार्क थी । पर सामान्यतः सभी की गाडियाँ बाहर पार्क थी । पर व्यवस्थित रखी हुई थी । हमने पहले अपना सामान निकाला।  हम लोगों का फ्लैट पहले फ्लोर पर था वहीं मकान मालिक का सौरभ  को मैसेज पहले ही आ गया था कि फ्लैट की चाबी मुख्य दरवाजे के नीचे रखी हुई है । चाबी से फ्लैट खोला गया तो बहुत ही अच्छा फ्लैट था । टू बीएचके फ्लैट को इतने अच्छे से सजाया गया था कि ऐसा लग रहा था कि काश यह फ्लैट अपना ही होता । इतने सलीके से सजाया गया था कि कोई किराये से भी दे रहा है तो लेने वाले को भी कोई तकलीफ नहीं होगी  इसका पूरा ध्यान रखा गया था । ड्राइंग रूम काफी बड़ा और वहां टीवी फ्रिज बड़ा सोफा लगा हुआ था।  किचन भी बहुत अच्छे लगा हुआ  था ।  पहले तो हम लोगों ने अपना सामान अपने अपने बेडरूम मे रखा फिर थोड़ी सी थकान हटाने के लिए सोफे मे बैठ गए ।  अब भूख भी लगने लगी थी हमने अपने भानजी भाई वाले पिटारे को खोला । नाश्ते का ही डिनर था फिर यही से ले गई इंस्टैंट चाय भी ली । अब थकान भी कम हो गई थोडी देर गप्प मारने के बाद दूसरे दिन हमे पास के शहर लयूसन जाना था उसकी बारे मे बात कर ली ।  अब काफी रात हो गई थी इसलिए सोने को चले गए  ।  पर यहां की वयवस्था ने विदेश के ही दिन चर्या से परिचित करा दिया था। क्रमशः
बस इतना ही 
डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ

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